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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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१६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ७ ॥
इसलिये (समुद्रः) समुद्र [सर्वं व्यापक परमात्मा] (उच्यते) कहा जाता है।
(ताः भीताः) वे डरी हुई (अब्रुवन्) बोलीं-(भगवन्तम् एव) भगवान् [श्रीमान्
आप] को ही (वयम्) हम (राजानम्) राजा (वृणीमहे इति) ग्रहण करती हैं।
(यत् च) और जो (वृत्वा) ग्रहण करके (अतिष्ठन्) वे ठहरीं, (तत्) उस से
(वरणः अभवत्) वह वरण [ग्रहण योग्य] हुआ । (तं वै एतं वरणं सन्तम्) उस ही
ऐसे वरण [ग्रहण योग्य] होते हुये को-(वरुणः इति आचक्षते) यह वरुण
[स्वीकरणीय] है-ऐसा वे कहते हैं (परोक्षेण) परोक्ष [आंख ओट प्रलय में
वर्त्तमान ब्रह्म] के द्वारा (परोक्षप्रियाः इव हि) परोक्ष प्रिय [आंख ओट भविष्य
के प्रेमी] लोगों के समान ही (देवाः) देवता [विद्वान् लोग] (प्रत्यक्षद्विषः)
प्रत्यक्ष [वर्त्तमान अवस्था] के द्वेषी (भवन्ति) होते हैं । [देखो कण्डिका १]।
(सः) वह [वरुण परमेश्वर] (समुद्रात्) समुद्र [सर्वव्यापक परमेश्वर से
(अमुच्यत) छूटा, (सः) वह (मुच्युः) मुच्यु [छुटा हुआ ईश्वर]
(अभवत्) हुआ। (तम्) उस [दूरवर्ती] (वै) निश्चय करके (एतम्)
इस [समीपवर्ती] · मुच्यु सन्तम्) मुच्यु [छुटे हुये ईश्वर] होते
हुवे को (मृत्युः इति आचक्षते) यह मृत्यु [छुटा हुआ वा छुड़ाने वाला मारने वाला
वा वियोग करने वाला ईश्वर] है-ऐसा वे कहते हैं। (परोक्षेण) परोक्ष [आंख ओट
प्रलय में वर्त्तमान ब्रह्म] के द्वारा (परोक्षप्रियाः इव हि) परोक्षप्रिय [आंख ओट भविष्य
के प्रेमी] लोगों के समान ही (देवाः) देवता [विद्वान् लोग] (प्रत्यक्षद्विषः) प्रत्यक्ष
[वर्त्तमान अवस्था] के द्वेषी (भवन्ति) होते हैं-[देखो कण्डिका १]। (तं वरुणम्)
उस वरुण [स्वीकरणीय] (मृत्युम्) मृत्यु [छूटने वा छुड़ाने वाले स्वरूप] को (अभि
अश्राम्यत्) उस [परमात्मा] ने सब ओर से दबाया, (अभि अतपत्) सब ओर से
तपाया (सम् अतपत्) भली भाँति तपाया, (तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य संतप्तस्य) उस
दबाये हुये, तपाये हुये, भली भाँति तपाये हुये के (सर्वेभ्यः अङ्गेभ्यः) सब अङ्गों से (रसः
अक्षरत) रस बहा। (सः अङ्गरसः अभवत्) वह अङ्गरस [सब के अङ्गों का रस]
हुआ, (तम् वै एतम्) उस निश्चय करके समीप और दूरवर्ती (अङ्गरसं सन्तम्) अङ्गों
का रस होते हुये को-(अङ्गिरा इति आचक्षते) यह अङ्गिरा [सर्वव्यापक] है-
ऐसा वे कहते हैं। (परोक्षेण) परोक्ष [आंख ओट प्रलय में वर्त्तमान ब्रह्म] के द्वारा
(परोक्षप्रियाः इव हि) परोक्ष प्रिय [आंख ओट भविष्य के प्रेमी] लोगों के समान ही
(देवाः) देवता [विद्वान् लोग] (प्रत्यक्षद्विषः) प्रत्यक्ष [वर्त्तमान अवस्था] के
द्वेषी (भवन्ति) होते हैं [देखो कण्डिका १] ॥ ७ ॥
२१) मुञ्च्लृ मोक्षणे-युक् । मुक्तः । प्राप्तमोक्षः (मृत्युः) भुजिमृद्भ्याम् युक्त्युको
मृङ् प्राणत्यागे-त्युक् । सर्वस्मात् त्यक्तः पृथग्भूतः । सर्वेषां त्याजयिता ।
मारयिता । वियोजकः (अक्षरत्) क्षर संचलने-लङ् । संचलितवान् (अङ्गरसः)
सर्वभूतानामङ्गानां रसः सारो वीर्यं वा (अङ्गिराः) अङ्गेरेसिः (उ० ४ ।
२३६) अगि गतौ असिः, तस्य च इरुडागमः । सर्वव्यापकः । महाज्ञानी ॥