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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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Page 52

१४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ६ ॥
दम्) यजुर्वेद [सत्कर्मों की विद्या] और (आदित्यात्) आदित्य [सर्व प्रकाशक स्वरूप]
से (सामवेदम्) सामवेद [मोक्षविद्या] को । (सः तान् त्रीन् वेदान्) उसने उन
तीनों वेदों को (अभि अश्राम्यत् अभि अतपत् सम् अतपत्) सब ओर से दबाया,
सब ओर से तपाया और भली भांति तपाया. (तेभ्यः श्रान्तेभ्यः तप्तेभ्यः संतप्तेभ्यः)
उन दबाये हुए, तपाये हुए. भली भांति तपाये हुओं से (तिस्रः महाव्याहृतीः) तीन
महाव्याहृतियों [महावाक्यों] को (निर् अमिमत) उस [परमात्मा] ने बनाया-
(भूः) भूः [सर्वाधार] (भुवः) भुवः [सर्वव्यापक] और (स्वः इति) स्वः
[सुख स्वरूप परमात्मा है-इनको]-(भूः इति) भूः को (ऋग्वेदात्) ऋग्वेद से
(भुवः इति) भुवः को (यजुर्वेदात्) यजुर्वेद से और (स्वः इति) स्वः को (साम-
वेदात्) सामवेद से। (सः यः) वह पुरुष जो (इच्छेत्) चाहे-(एतैः सर्वैः) इन
सब (त्रिभिर्वेदैः) तीनों वेदों से (कुर्वीय इति) मैं [पुरुषार्थ] करूँ-(तम्) उस
[पुरुषार्थ] को (एताभिः एव महाव्याहृतिभिः) इन ही महाव्याहृतियों से (कुर्वीत)
वह करे। (अस्य) उस [पुरुष] का (एतैः सर्वैः) इन सब (त्रिभिः वेदैः)
तीनों वेदों से (ह वै) ही अवश्य (कृतम्) कर्म (भवति) होता है, (यः एवम्
वेद.) जो ऐसा जानता है, (च यः) और जो (एवम् विद्वान्) ऐसा विद्वान् [होकर]
(एताभिः महाव्याहृतिभिः) इन महाव्याहृतियों से (कुरुते) कर्म करता है॥ ६॥
भावार्थः-परमेश्वर ने अपने सर्वशक्तिमत्ता, सर्वज्ञता और सर्वव्यापकता से
कर्म, उपासना, ज्ञान त्रयी विद्या और भूर्भुवः स्वः इन तीन महाव्याहृतियों को मनुष्यों
के सुख के लिए प्रकाशित किया है। पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्यौ, अग्नि वायु आदित्य
आदि परमेश्वर के नाम हैं और तीन वेदों अर्थात् त्रयी विद्या कहने से अथर्ववेद सहित चारों
वेदों का ग्रहण है। पृथिवी आदि बहुत से शब्द ईश्वर नाम वाची महर्षि दयानन्द कृत
सत्यार्थ प्रकाश प्रथम समुल्लास में व्याख्यात हैं। अग्नि आदि ईश्वर के नाम हैं। इसका
प्रमाण-तदेवाग्निस्तदादित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म ता आपः स
प्रजापतिः ॥ यजु० ३२।१। अर्थः - (तत् एव) वही [ब्रह्म] (अग्निः)
स्वरूपम्। (वेदान्) हलश्च (पा० ३।३।१२१) विद ज्ञाने, विद सत्तायां
विद विचारणे-घञ् । त्रयीविद्यायुक्तान् परमेश्वरीयबोधान् (ऋग्वेदम्)
ऋचन्ति स्तुवन्ति पदार्थानां गुणान् अनया सा ऋक्, ऋक् चासौ वेदश्च ऋग्वेदः।
पदार्थगुणप्रकाशिकां विद्याम् (यजुर्वेदम्) अत्तिपूवपियजि० (उ० २।११७)
यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु-उसिः । सत्कर्मप्रकाशिकां विद्याम् (साम-
वेदम्) सातिभ्यां मनिन्मनिणो (उ० ४। १५३) -षो अन्तकर्मणि-मनिन् ।
दुःखनाशिकां मोक्षविद्याम् (भूः) भू सतायां प्राप्तौ-क्विप् । सर्वाधारः परमेश्वरः
(भुवः) भूरिञ्जिभ्यां कित् (उ० ४। ११७) भू सत्तायां प्राप्तौ-असुन्। सर्व-
व्यापकः शुद्धस्वरूपः परमेश्वरः (स्वः) अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते (पा० ३।२।७५)
सु+ऋ गतौ विच्, यद्वा स्वृ शब्दोपतापयो :-विच् । सुखस्वरूपः । परमेश्वरः ।।