गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
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Read in contextगोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ५ ॥ ११
वाले, (सप्तदशान्) सत्रहवें [चार दिशा, चार विदिशा, एक उपर की एक नीचे की,
दस दिशायें—सत्त्व, रज, और तम तथा ईश्वर, जीव और प्रकृति—इन सोलह के सहित
सत्रहवें संसार] से सम्बन्ध वाले, (अष्टादशान्) अट्ठारहवें [धैर्य, सहन, मन का
रोकना, चोरी न करना, शुद्धता जितेन्द्रियता, बुद्धि, विद्या, सत्य, क्रोध न करना—यह दश
धर्म—तथा ब्राह्मण, गो, अग्नि, सुवर्ण, घृत, सूर्य, जल—इन सात मंगलों के सहित
अठारहवें राजा], से सम्बन्ध वाले, (नवदशान्) उन्नीसवें [ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य,
शूद्र—चार वर्ण, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास—चार आश्रम, सत्संग सुनना,
विचारना, ध्यान करना—चार कर्म, अप्राप्त की इच्छा, प्राप्त की रक्षा, रक्षित की वृद्धि,
बढ़े हुये का सन्मार्ग में व्यय करना, चार पुरुषार्थ--मन बुद्धि इन अट्ठारह के सहित
उन्नीसवें अहङ्कार] से सम्बन्ध वाले (विंशान् इति) और बीसवें [पृथिवी आदि
पांच सूक्ष्मभूत, पृथिवी आदि पांच स्थूल भूत—कान, आंख, नासिका, जिह्वा, त्वचा पांच
ज्ञानेन्द्रिय और वाक्, हाथ, पांव, पायु, इन उन्नीस के सहित बीसवें उपस्थेन्द्रिय] से
सम्बन्ध वाले [सूक्ष्म विज्ञानों को उस ब्रह्म ने बनाया]-[इस विषय के लिये देखो
अथर्व काण्ड १९ सूक्त २३ मन्त्र ८-१७]। (तान्) उन (अथर्वणः) अथर्वा [निश्चल]
(ऋषीन्) ऋषियों [सन्मार्ग दर्शक वेदज्ञानों] (च) और (आथर्वणान्)
आथर्वण [निश्चल ब्रह्म से आये हुये] (आर्षेयान्) आर्षेयों [ऋषियों वेदज्ञानों में
विख्यात सूक्ष्म विज्ञानों) को (श्रमि-अश्राम्यत्) उस [ब्रह्म] ने सब ओर से दबाया
(अभि अतपत्) सब ओर तपाया, (सम् अतपत्) भली भांति तपाया। (तेभ्यः
श्रान्तेभ्यः तप्तेभ्यः सन्तप्तेभ्यः) उन दबाये हुए, तपाये हुए, भली भांति तपाये हुये
[बीसों] से (यान्) जिन (मन्त्रान्) मन्त्रों [अति-सूक्ष्म विचारों] को (अपश्यत्)
उस [ब्रह्म] ने देखा, (सः) वह (आथर्वणः) आथर्वण [निश्चल ब्रह्म का]
(वेदः) वेद (अभवत्) हुआ [अर्थात् समस्त चारों वेदोक्त विज्ञान प्रकट हुये]
(तम्) उस (आथर्वणम् वेदम्) आथर्वण वेद [निश्चल ब्रह्म के विज्ञान] को (अभि
अश्राम्यत्) उस [ब्रह्म] ने सब ओर से दबाया, (अभि अतपत्) सब ओर से
तपाया, (सम् अतपत्) भली भांति तपाया। (तस्मात् श्रान्तात् तप्तात्
सन्तप्तात्) उस दबाये हुये, तपाये हुये, भली भांति तपाये हुये [वेद] से (ओम्
इति मनः एव) ओम् [सर्वरक्षक अर्थात्] मन [मननशील ब्रह्म] ही (ऊर्ध्वम्)
श्वराद् आगतान् प्राप्तान् (आर्षेयान्) पथ्यतिथिवसतिस्वपतेढञ् (पा० ४।
४।१०४) ऋषि-ढञ्, बाहुलकात्। ऋषिषु विख्यात आर्षेयः-महीधर भाष्ये,
यजु० ७।४६। आर्षेयः ऋषिषु साधुस्तत्सम्बुद्धौ-दयानन्द भाष्ये यजु०
२१।६१। ऋषिषु वेदमन्त्रेषु विख्यातानि सूक्ष्मविज्ञानानि (एकादशान्) तस्य
पूरणे डट् (पा० ५।२।४८) एकादशन्-डट्। अंशंआदिभ्योऽच् (पा० ५।
२।१२७) एकादश-अच्। प्राणापानोदानव्यानसमानागकूर्म्मकृकलदेवदत्त
धनञ्जयाः-इति दशभिः प्राणैः सहितस्यैकादशस्य जीवात्मनः सम्बद्धानि
विज्ञानानि (द्वादशान्) आदीनि पदान्येवमेव साधनीयानि योजनीयानि च