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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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Page 478

४४० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १५
करने वाले, (मघवानम्) बहुत धन वाले, (उक्थ्यम्) प्रशंसा योग्य, (वावृधानम्)
बढ़ते हुये, (पुरुहूतम्) बहुत पुकारे गये (अमर्त्यम्) अमर, (सुवृत्तिभिः) सुन्दर
ग्रहण योग्य क्रियाओं से (जरमाणम्) स्तुति किये जाते हुये (इन्द्रम्) इन्द्र [बड़े
ऐश्वर्य्य वाले राजा] की (दिवेदिवे) दिन दिन (अभि) सब ओर से (अनूषत)
बड़ाई करें ॥
५—अस्तभ्नाद् द्यामसुरो विश्ववेदा अभिमीत वरिमाणं पृथिव्याः । आसीदद् विश्वा
भुवनानि सम्राड् विश्वेत्तानि वरुणस्य व्रतानि—ऋ० ८ । ४२ । १ ॥ (असुरः) बुद्धिमान्,
(विश्ववेदाः) सम्पूर्ण धन वाले परमात्मा ने (द्याम्) सूर्य लोक को (अस्तभ्नात्)
थांभा है और (पृथिव्याः) पृथिवी की (वरिमाणम्) चौड़ाई को (अभिमीत) नापा
है। (सम्राट्) सम्राट् [वह राजराजेश्वर परमात्मा] (विश्वा) सब (भुवनानि)
भुवनों में (आ असीदत्) आकर बैठा है, (तानि इत्) वे ही (विश्वा) सब (वरु-
णस्य) वरुण [स्वीकार करने योग्य परमेश्वर] के (व्रतानि) कर्म हैं ॥
६—इन्द्रावरुणा युवमध्वराय नो विशे जनाय महि शर्म यच्छतम् । दीर्घप्रयज्युमति
यो वनुष्यति वयं जयेम पृतनासु दूढचः—ऋ० ७ । ८२ । १ ॥ (इन्द्रावरुणा) हे इन्द्र
और वरुण ! [बड़े ऐश्वर्य वाले राजा और स्वीकार करने योग्य मन्त्री] (युवम्) तुम
दोनों (अध्वराय) हिंसा रहित यज्ञ के लिये (नः) हमारी (विशे) प्रजा को और
(जनाय) कुटुम्बियों को (महि) बड़ा (शर्म) स्थान (यच्छतम्) दो (यः) जो
[शत्रु] (दीर्घप्रयज्युम्) बड़े यज्ञ करने वाले पुरुष को (अति) उल्लंघन करके
(वनुष्यति) मारे, [उसको और] (दूढचः) दुर्बुद्धियों को (पृतनासु) संग्रामों में
(वयं जयेम) हम जीतें ॥
७—आ वां राजानावध्वरे ववृत्यां हव्येभिरिन्द्रावरुणा नमोभिः । प्र वां घृताची बाह्वो-
र्दधाना परि त्मना विषुरूपा जिगाति-ऋ० ७ । ८४ । १ ॥ (राजानौ) हे राजाओ (इन्द्रा-
वरुणा) इन्द्र और वरुण ! [बड़े ऐश्वर्य वाले राजा और स्वीकार करने योग्य मन्त्री]
(वाम्) तुम दोनों को (अध्वरे) हिंसारहित यज्ञ में (हव्येभिः) देने और लेने योग्य
पदार्थों और (नमोभिः) सत्कारों से (आ ववृत्याम्) मैं लौटाऊँ। (बाह्वोः)
[हमारी] दोनों भुजाओं में (दधाना) रक्खी हुई (घृताची) घृत पहुँचाने वाली
[चमची] (त्मना) अपने आप (विषुरूपा) नानाविध स्वभाव वाले (वाम्) तुम
दोनों को (परि) सब ओर से (प्र जिगाति) पहुँच जाती है।
८—इन्द्रावरुणा मधुमत्तमस्य वृष्णः सोमस्य वृषणा वृषेथाम् । इदं वामन्धः परिषिक्त-
मासद्यास्मिन् बर्हिषि मादयेथाम्—अथर्व० ७ । ५८ । २, ऋ० ६ । ६८ । ११ ॥ (वृषणा)
हे बलिष्ठ ! (इन्द्रावरुणा) बिजुली और वायु [के समान राजा और प्रजाजनो] तुम
(मधुमत्तमस्य) अत्यन्त ज्ञानयुक्त, (वृष्णः) बल करने वाले (सोमस्य) ऐश्वर्य की
(आववृषेथाम्) भले प्रकार वर्षा करो। (वाम्) तुम दोनों का (इदम्) यह (परि-
षिक्तम्) सब प्रकार सींचा हुआ (अन्धः) अन्न है, (अस्मिन्) इस (बर्हिषि) वृद्धि
कर्म में (आसद्य) बैठ कर (मादयेथाम्) आनन्दित करो ॥