गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
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Read in context४२६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० ९ ॥
स्वर्गं लोकम् एति ) जो उस [ वेदी ] को उष्ण न करके वह [ यजमान ] चला जावे, उस
[ यजमान ] को ही उस यमलोक में ताड़ना करें, जो ब्याज वाला ऋण है वह रोग के ज्ञान
से युक्त है—ऐसा विचार कर वेदी को उष्ण करते हैं, यहाँ ही संयम [ इन्द्रियनिग्रह ] करता
हुआ ब्याज वाले ऋण को चुकाकर बिना ऋण होकर वह [ यजमान ] स्वर्गं लोक पाता है।
( विश्वलोप विश्वदावस्य त्वा सं जुहोमि--इति आह ) हे विश्व के नाश करने वाले
[ अग्नि ! ] तुझ विश्वतापक को मैं अच्छे प्रकार होम करता हूं—यह [ ब्राह्मण वचन ] वह
बोलता है। ( होता अद्धा यजमानस्य अपराभवाय, यत् उ मिश्रम् इव चरन्ति,
अञ्जलिना सक्तून् प्रदाव्ये जुहुयात् ) होता साक्षात् यजमान के जिताने के लिये है, जो
मिश्र [ मिले हुए अन्न ] को वे चरु [ हव्य पदार्थ ] बनावें, अञ्जलि से [ दोनों हाथ मिलाये
हुए ] सक्तु [ भुंजे हुए जौ आदि चूर्ण ] को तपाने में कुशल [ अग्नि ] में हवन करे ।
( एषः ह वै वैश्वानरः अग्निः यत् प्रदाव्यः, तत् स्वस्याम् एव योन्याम् एनं सादयति )
यह ही वैश्वानर [ सब नरों का हितकारी ] अग्नि है, जो तपाने में कुशल है, तब वह
[ अग्नि ] अपने ही घर में इस [ यजमान ] को स्थापित करता है ॥ ८ ॥
भावार्थः—जैसे यज्ञ में आहुति देने से अग्नि तृप्त होकर यजमान को स्वर्गं लोक में
पहुँचाता है, वैसे ही अन्न के भोजन से जठराग्नि तृप्त होकर प्राणी को पुष्ट करता है ॥८॥
कण्डिका ९ ॥
अह्नां विधान्यामेकाष्टकायामपूपञ्चतुःशरावं पक्त्वा प्रातरेतेन कक्षमुपोषेत्।
यदि दहति पुण्यसमं भवति, यदि न दहति पापसमं भवति । एतेन ह स्म वा अङ्गि-
रसः पुरा विज्ञानेन दीर्घसत्रमुपयन्ति । यो ह वा उपद्रष्टारमुपश्रोतारमनुख्यातारमेव
विद्वान् यजते, समममुष्मिल्लोक इष्टापूर्तेन गच्छते । अग्निर्व्वा उपद्रष्टा, वायुर्वा उप-
श्रोता, आदित्यो वा अनुख्याता, तान्य एवं विद्वान्यजते, समममुष्मिल्लोक इष्टापूर्तेन
गच्छते अयन्त्रो नभसस्पतिरित्याह, अग्निर्वै नभसस्पतिरग्निमेव तदाह । एतन्नो गोपा-
कासहितम् ऋणम् ( आदत्ते ) गृह्णाति ( अनुपोष्या ) अनु+उप+उष दाहे--ल्यप् ।
अदग्ध्वा ( प्रयायात् ) प्रगच्छेत् ( यातयेरन् ) यत ताडने--वि० लि०। हन्युः।
ताडनां पीडां कुर्युः ( कुसीदमयम् ) ऋणमयं कर्म ( अप्रतीतम् ) अम रोगे--
घञ्+प्रति+इण् गतौ--क्तः। रोगप्रतीतियुक्तम् ( उपोषन्ति ) उपेत्य दहन्ति
( संयमन् ) सम्+यम नियमे--शतृः । संयममिन्द्रियनिग्रहं कुर्वन् ( निर-
वदाय ) निर्+अव+दो अवखण्डने--ल्यप् । शोधयित्वा ( विश्वलोप ) विश्वस्य
संसारस्य लोपो नाशो यस्मात् तत् सम्बुद्धौ ( विश्वदावस्य ) दुञ्योरनुपसर्गे ( पा०
३।१।१४२ ) दुञ् उपतापे--णः । सर्वोपतापकम् ( अद्धा ) साक्षात् । अवधारणेन
( अपराभवाय ) अपराजयाय ( मिश्रम् ) मिश्रितमन्नम् ( चरन्ति ) चरुं हव्यान्नं
कुर्वन्ति ( सक्तून् ) सितनिगममिसिसच्चवि० ( उ० १।६६ ) षच सेचने--तुन् ।
भृष्टयवादिचूर्णम् ( प्रदाव्ये ) तत्र साधुः ( पा० ४।४।६८ ) प्रदाव--यत् ।
प्रकर्षेण दाहकुशले अग्नौ ( वैश्वानरः ) सर्वनरहितः ( प्रदाव्यः ) प्रदाहकुशलः
( सादयति ) स्थापयति ॥