गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
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Read in context४१० गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ४ । क० १
यज्ञ की रक्षा करते हैं जो पुरुष ऐसा जानता है जो पुरुष ऐसा जानता है [ द्विर्वचन
प्रपाठक की समाप्ति बताता है ] ॥ २३ ॥
भावार्थः—जैसे यज्ञ में एक इन्द्र की स्तुति करने से अन्य देवताओं की स्तुति हो
जाती है, वैसे ही एक श्रेष्ठ महाप्रतापी पुरुष की बड़ाई में उसके साथियों की बड़ाई
हो जाती है ॥ २३ ॥
विशेषः—ऊपर प्रतीक वाला मन्त्र अर्थ सहित पूरा लिखा जाता है—
प्रेन्द्रस्य वोचं प्रथमा कृतानि प्र नूतना मघवा या चकार । यदेददेवी-
रसहिष्ट माया अथाभवत् केवलः सोमो अस्य--अथ० २० । ८७ । ५, ऋ० ७ ।
९८ । १ ।। ( इन्द्रस्य ) इन्द्र [ महाप्रतापी वीर ] के ( प्रथमा ) पहिले और ( नूतना )
नवीन ( कृतानि ) कर्मों को, ( या ) जो ( मघवा ) उस महाधनी ने ( चकार ) किये
हैं, ( प्र प्र वोचम् ) बहुत अच्छे प्रकार मैं कहूं । ( यदा इत् ) जब ही ( अदेवीः )
अदेवी [ विद्वानों के विरुद्ध, आसुरी ] ( मायाः ) मायाओं [ छल कपट क्रियाओं ] को
( असहिष्ट ) उसने जीत लिया है, ( अथ ) तब ही ( सोमः ) सोम [ अमृत रस
अर्थात् मोक्ष सुख ] ( अस्य ) उस [ पुरुषार्थी ] का ( केवलः अभवत् ) सेवनीय
हुआ है ॥
इति श्रीमद्राजाधिराज-प्रथितमहागुणमहिम-श्रीसयाजीराव-गायकवाड़ा-
धिष्ठित बड़ोदेपुरीगत श्रावणमासदक्षिणापरीक्षायाम् ऋक्सामार्थववेदभाष्येषु
लब्धदक्षिणेन श्रीपण्डितक्षेमकरणदासत्रिवेदिना अथर्ववेदभाष्यकारेण कृते
गोपथब्राह्मणभाष्य उत्तरभागे द्वितीयः प्रपाठकः समाप्तः ॥
अयं प्रपाठकः प्रयागनगरे माघमासे कृष्णतृतीयायां तिथौ १९८० [ अशी-
त्युत्तरैकोनविंशतिशतके ] विक्रमीये संवत्सरे सुसमाप्तिमगात् ॥
मुद्रितम्-आश्विन कृष्णा ७ संवत् १९८१ वि० ता० २० सेप्टेम्बर सन् १९२४ ई० ॥
अथ चतुर्थः प्रपाठकः
कण्डिका १ ॥
ओम् । कया नश्चित्र आ भुवत्, कया त्वं न ऊत्येति मैत्रावरुणस्य स्तोत्रि-
यानुरूपौ । कस्तमिन्द्र त्वावमुमिति बार्हतः प्रगाथः । तस्योपरिष्टाद् ब्राह्मणम् ।
सद्यो ह जातो वृषभः कनीन इति उक्थमुखम् । एवा त्वामिन्द्र वज्रिन्नत्रेति
पर्यासः । उशन्नु षु णः सुमना उपाक इति यजति । एतामेव तद्देवतां यथाभागं
प्रीणाति, वषट्कृत्यानुवषट् करोति । प्रत्येवाभिमृशन्ते नाप्याययन्ति, न ह्वानाराश-
धंसाः सीदन्ति ॥ १ ॥