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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

Page 426 of 600

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Page 426

३८८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० १३ ॥
वाम् उषसः बुधिः सूर्यस्य रश्मिभिः साकम्--इति ऋचा अभ्यनूक्तम् ) क्योंकि वह
ही [ मैत्रावरुण ] मित्र और वरुण वाले स्तोत्र [ इस प्रकार ] पढ़ता है--हे मित्र और
वरुण ! [ हितकारक और उत्तम आचरण वाले पुरुषो ] तुम दोनों को सूर्य के उदय होने
पर सत्कारों और ग्रहण करने योग्य अन्नों से प्रत्यक्ष करके हम पूजें, और तुम दोनों को प्रभात
वेला के ज्ञान में सूर्य की किरणों के साथ [ हम पूजें ]—यह इस ऋचा [ ब्राह्मण वचन ]
करके अनुकूल कहा गया है । ( रिशादसा मित्रावरुणा मा, नः नः गन्तम्, इति
मैत्रावरुणस्य स्तोत्रियानुरूपौ ) हे दुःख के नाश करने वाले मित्र और वरुण [ हितकारक
और उत्तम आचरण वाले पुरुषो ] तुम दोनों मत [ जाओ ], हमको हमको प्राप्त हो--
यह [ और पहिला ब्राह्मण वचन ] मैत्रावरुण के स्तोत्र के अनुरूप दो [ मन्त्र ] हैं । ( प्र वो
मित्राय गायत--इति उक्थमुखम्, प्र मित्रयोर्वरुणयोः, इति पर्यासः, आ यातं
मित्रावरुणा--इति यजति ) प्र वो मित्राय गायत--ऋग्० ५ । ६८ । १, यह उक्थ यज्ञ
का आरम्भ है, प्र मित्रयोर्वरुणयोः-ऋग्० ७ । ६६ । १, यह अन्त है, आ यातं मित्रावरुणा--
ऋग्० ७ । ६६ । १६, इससे वह यज्ञ करता है । ( एते एव देवते तत् यथाभागं प्रीणाति,
वषट्कृत्य अनुवषट्करोति ) इन ही दोनों देवताओं को उससे अपने अपने भाग के अनुसार
वह प्रसन्न करता है, और वषट्कार करके अनुवषट्कार [ अन्तिम आहुति दान ] करता
है । ( प्रति एव अभिमृशन्ते, अनाराशंसाः न आप्याययन्ति न हि सीदन्ति ) वे
[ ऋषि लोग ] प्रत्यक्ष ही विचारते हैं--नरों की स्तुति रहित यज्ञ न बढ़ाते हैं और नहीं
चलते हैं [ नहीं बढ़ते हैं ] ॥ १३ ॥
भावार्थः—चतुर मनुष्य विद्वानों की स्तुति उनके गुणों के अनुकूल करते हैं, उससे
संसार में आनन्द बढ़ता है ॥ १३ ॥
विशेषः—प्रतीक वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ।
१—प्र वो मित्राय गायत वरुणाय विपा गिरा । महिक्षत्रावृतं बृहत्--ऋग्०
५ । ६८ । १ ॥ [ हे विद्वानों ] ( वः ) अपने लिये ( विपा गिरा ) प्रेरित [ वेद ] वाणी
से ( मित्राय ) मित्र [ हितकारक ] और ( वरुणाय ) वरुण [ उत्तम आचरण वाले
पुरुष ] की ( प्र गायत ) अच्छे प्रकार बड़ाई करो । ( महिक्षत्रौ ) वे दोनों बड़े हानि से
बचाने वाले ( बृहत् ) बड़े ( ऋतम् ) सत्य नियम रूप हैं ॥
( नमोभिः ) सत्कारैः ( उत ) च ( हव्यैः ) ग्राह्यैरन्नैः ( बुधिः ) भुवः कित्
( उ० २ । ११२ ) बुध अवगमने--इसिन्, विभक्तेर्लुक् । बुधिसि । बोधे ( मा )
निषेधे ( मा गन्तम् ) मा गच्छतम् ( नः ) अस्मान् ( रिशादसा ) शत्रुनाशकौ
( पर्यासः ) परि उपरमे + अस सत्तायां--घञ् । समाप्तिः । अन्तः ( अभिमृशन्ते )
सर्वतो विचारयन्ति ऋषयः ( न ) निषेधे ( आप्याययन्ति ) वर्धयन्ति ( अनाराशंसाः )
नञ् + नृ नये--अच् + शंसु हिंसायां स्तुतौ कथने च--घञ् । नराः नेतारः शस्यन्ते
प्रशस्यन्ते यत्र स नराशंसः, नराशंसः एव नाराशंसः । नराणां प्रशंसारहितो यज्ञः
( सीदन्ति ) गच्छन्ति । प्रवर्त्तन्ते ॥