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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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४ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० २ ॥
हुईं । ( तत् च धाराणां धारात्वं यत् आसु ध्रियते ) और वह धाराओं का धारापन
[ धारण सामर्थ्य ] है जो इन सब में धरा गया है ( तत् यत् अब्रवीत् ) वह जो उसने
कहा—( आभिः वै अहम् इदं सर्वं जनयिष्यामि यत् इदं किञ्च इति ) इनसे ही
मैं इन सब को उत्पन्न करूंगा यह जो कुछ भी [होगा ] ( तस्मात् जायाः अभवन् )
उससे वे [ पसीने की धारायें ] जायायें [ माताओं समान उत्पन्न करने वाली शक्तियां ]
हुईं, ( तत् च जायानां जायात्वं यत् आसु पुरुषः जायते ) और वह जायाओं का
जायापन [ उत्पादन सामर्थ्य ] है जो इनमें पुरुष [जीव] उत्पन्न होता है, (यत् च पुत्रः)
और जो पुत्र [ संतान वा जीव ] होता है । ( पुत् नाम नरकम् ) पुत् [ जिस अवस्था
में पापी लोग जाते हैं ] नाम वाला नरक ( अनेकशततारम् ) अनेक सैकड़ों दबाव
वाला है, ( तस्मात् पुत्रः त्राति ) उस [नरक] से पुत्र बचाता है, (तत् पुत्रस्य पुत्रत्वम्)
वह पुत्र का पुत्रपन [ नरक से बचाना ] है । ( तत् यत् अब्रवीत् ) वह जो उसने कहा
—( आभिः वै अहम् इदं सर्वम् आप्स्यामि यत् इदं किञ्च इति ) इन [ पसीने की
धाराओं ] से ही मैं इस सबमें व्यापूंगा यह जो कुछ भी [ होगा ]--( तस्मात् आपः
अभवन् ) उससे वे आप् [ व्यापक जल ] हुये, ( तत् अपाम् अप्त्वम् ) वह जलों
का जलपन [ व्यापकपन ] है । ( सः वै सर्वान् कामान् आप्नोति यान् कामयते )
वह अवश्य सब कामनायें पाता है जिन्हें वह चाहता है [जो ऐसा विद्वान् है-देखो कण्डिका
३, ४ ] ॥ २ ॥
भावार्थः- जगत् की उत्पत्ति से ब्रह्म के पसीने की तीन अवस्थायें मानी हैं,
एक धारण सामर्थ्य, दूसरी उत्पादन सामर्थ्य और तीसरी ब्यापन सामर्थ्य ॥ २ ॥
विशेषः- १ इस कण्डिका के इन पदों में समता मानी है, धारयिष्यामि तथा
धाराः ) दोनों पद धृञ् धारणे से, (जनयिष्यामि तथा जायाः) जन वा जनी जनने से और
( आप्स्यामि तथा आपः ) आप्लृ व्याप्तौ, प्राप्तौ से बने हैं ।।
विशेषः-२ यहां कण्डिका १-२ का मिलान करो- "हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः
पतिरेक आसीत् । स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम" ।। हिरण्यगर्भ,
तेज वाले लोकों का आधार, पहिले ही वर्तमान था, वही प्रकट होकर पृथिवी आदि पंचभूत
का एक पति हुआ, उसने पृथिवी और सूर्य को धारण किया, उस सुखदायक प्रजापति की
दिव्य गुण के लिए भक्ति के साथ हम सेवा करें--अथर्व० ४ । २ । ७ । ( आपो वत्सं
धारणसामर्थ्यम् ( ध्रियते ) स्थाप्यते जायाः- जनेर्यक् ( उ० ४ । १११ ) जन
जनने-यक् । मातृसदृश्य उत्पादनशक्तयः । पुरुषः । पुरः कुषन् ( उ० ४ । ७४ )
पुरः- अग्रगमने-कुषन् । जीवः । पुत्रः । पुवो ह्रस्वश्च ( उ० । ४ । १६५ ) पूञ्
पवने-क्त्रः, धातोर्ह्रस्वत्वम्, अथवा पुत्+त्रैङ् पालने-कः । पुत्रः पुन्न त्रायते
निपरणाद्वा पुन्नरकं ततस्त्रायत इति वा-निरु० २ । ११ । सन्तानः । जीवः (पुत्)
पुत पुत्त गतौ-क्विप् । गच्छन्ति पापिनो यत्र नरकम् । नरकम् । कॄनादिभ्यः संज्ञायां
बुन् ( उ० ५ । ३५ ) नॄ नये-वुन् । दुःखभोगावस्थाभेदः । ( अनेकशततारम् )
तॄ प्लवनसं तरणयोः स्वार्थे णिच्-घञ् बहुविधाभिभवयुक्तम् । त्राति । त्रायते