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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

Page 413 of 600

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Page 413

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० ८ ३७५
सर्वे ऋत्विजः, वाक् यक्षत् वाक् यक्षत् इति ) [ समाधान ] वाणी ही होता, [ हवन
करने वाला ] है, वाणी ही सब ऋत्विज् लोग हैं—वाणी यज्ञ करे, वाणी यज्ञ करे [ यह
उसका अभिप्राय है ] । ( अथो सर्वे वै एते सप्त होतारः अपि वै ऋचा अभ्युदितं,
सप्त होतारः ऋतुथा यजन्ति इति ) और यह सब ही सात हवन करने वाले होते हैं, यह
ही इस ऋचा द्वारा कहा गया है—सात हवन करने वाले ऋतु ऋतुओं के अनुसार हवन
करते हैं [ यह ब्राह्मण वचन है—इसको आगे टिप्पणी में दिये यजु० ३४ । ५५ के आशय
से मिलाओ ] । ( अथ यः उपरिष्टात् द्वादशर्चंजामितायै ते वै द्वादश भवन्ति, द्वादश
ह वै मासाः संवत्सरः, संवत्सरः प्रजापतिः, प्रजापतिः यज्ञः ) फिर जो पहिले से बारह
ऋचाओं से सम्बन्ध के लिये हैं वे बारह हैं, बारह ही मास होते हैं । संवत्सर यज्ञ होता है,
संवत्सर [ वर्ष ] प्रजापति है, 'प्रजापति यज्ञ है । ( सः यः अत्र भक्षयेत्, यः=सः, तं तत्र
ब्रूयात्, अशान्तः भक्षः अनुवषट्कृतः आत्मानम् अन्तः न अगात्, न जीविष्यति इति )
सो जो यहां [ यज्ञ में ] भोजन करे, वह उस [ भोजन विषय ] को वहां बोले—अशान्त
भोजन अनुवषट् [ समाप्तिसूचक यज्ञ ] करने वाले के आत्मा में नहीं जाता, वह [ उसे ]
न जिलावेगा । ( तथा ह अस्य आद्यः वै भक्षयेत्, प्राणः भक्षः प्राणः आत्मानम् अन्तः
अगात् इति ) इस कारण से ही इस [ यज्ञ ] के खाने योग्य पदार्थ को ही वह खावे, प्राण
भोजन है जो वह प्राण आत्मा में पहुँचता है । ( तथा एव ह भवति लिम्पेत् इति वाव तत्र
च द्विदेवत्येषु च जिघ्रेत् इति ) वह वैसा ही होता है कि वह [ भोजन उसे ] बढ़ावे, और
वहां ही उसको दो देवता वाले यज्ञों में वह ग्रहण करे । ( तत्र तत् उ शासनं वेदयन्ते,
अथ यत् अमू अध्वर्यू व्यभिचरतः, अन्योऽन्यं नाना अनुप्रपद्येते, तस्मात् ऋतुः ऋतुं
न अनुप्रपद्यते ) वहां पर यह शासन बताते हैं—फिर जब दो अध्वर्यु विरुद्ध व्यवहार करते
हैं और एक दूसरे के बिना दोनों चले चलते हैं, इसलिये ऋतु ऋतु को साथ साथ प्राप्त
नहीं होते ॥ ८ ॥
वेदवाचं शंसन्ति कथयन्ति तेभ्यः (अभ्युदितम्) सर्वतः कथितम् (ऋतुथा) ऋतुप्रकारेण ।
ऋतुना ऋतुना (द्वादशर्चंजामितायै) जमतिर्गतिकर्मा-निघ० २। १४ । जनिघसिभ्यामिण्
( उ० ४ । १३० ) जमु भक्षणे गतौ च—इण् । जामिशब्दः समानजातीयवाचकः ।
द्वादशर्चैः संबन्धाय संयोगाय ( अनुवषट्कृतः ) अनुवषट्कारकस्य ( आत्मानम् )
शरीरम् । जीवम् ( अन्तः ) मध्ये ( अगात् ) गच्छति ( जीविष्यति ) जीवयिष्यति
( आद्यः ) आद्यं भक्षणीयं पदार्थम् ( प्राणः ) प्राणवायुः । ( लिम्पेत् ) वर्धयेत्
( जिघ्रेत् ) घ्रा गन्धोपादाने ग्रहणमात्रे च । गृह्णीयात् ( द्विदेवत्येषु ) द्विदेवताकेषु
मन्त्रेषु ( व्यभिचरतः ) विरोधेन गच्छतः ( नाना ) बिना ॥
१. भाष्यकार का यह अर्थ सोमयाग की प्रक्रियानुसार संगत प्रतीत नहीं होता, क्योंकि
सोमयाग में अनुवषट्कार प्रधानाहुति का समर्थक एवं समाप्ति सूचक होता है, अतः उन
आहुतियों से रहित जो यज्ञ का यज्ञशेष होगा वह 'अशान्त भक्ष' होगा । यह यहाँ
तात्पर्य है । विषय का स्पष्टीकरण भूमिका में देखें ॥ सम्पा० ॥