गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
DevanagariSanskritpublished600 pages
Page 395 of 600
Read in contextPage 395गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० २३ ॥ ३५७
गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० ३ । क० २३ ॥ ३५७
ऋचा से आग्नीध्र यज्ञ करता है। ७ । (रथमिव सं महेमा मनीषया......-इति बहूनि
वा ह, तत् ऋभूणां रूपम्) रथमिव सं......-[ पूर्वोक्त मन्त्र के इस भाग में ] जो
बहुवचनान्त पद है, वह ऋभुओं का रूप है। (एवम् उ ह एताः ऐन्द्रार्भव्यः भवन्ति,
यत् नानादेवत्याः तेन अन्याः देवताः प्रीणाति) इस प्रकार से ही यह सब इन्द्र और
ऋभु देवताओं की ऋचायें हैं, जो अनेक देवता वाली हैं उनसे दूसरे देवताओं को वह प्रसन्न
करता है! (यत् उ जगत्ग्रासाहै, जागतम् उ वै तृतीयसवनम्, तृतीयसवनस्य
समष्टयै) जो [ यह ऋचायें ] संसार की बड़ी सहायता के लिये हैं, संसार के हित के लिये
ही यह तृतीयसवन है, [ वे ऋचायें ] तृतीयसवन की सिद्धि के लिये हैं ॥ २२ ॥
भावार्थः-कण्डिका २० के समान है ॥ २२ ॥
विशेषः १-इस कण्डिका को ऐतरेय ब्राह्मण ६ । १२ से मिलाओ ॥
विशेषः २-(रघुष्यदः और इन्द्रविष्ण ) के स्थान पर ( रघुष्यदः और
इन्द्राविष्णू ) वेद और ऐतरेय ब्राह्मण से यथासंख्य ठीक किये गये हैं ॥
विशेषः ३-संकेत वाले मन्त्र अर्थ सहित लिखे जाते हैं ॥
१-इन्द्र ऋभुभिर्वाजवद्भिः समृक्षितं सुतं सोममा वृषस्वा गभस्त्योः ।
धियेषितो मघवन् दाशुषो गृहे सौधन्वनेभिः सह मत्सवा नृभिः-ऋ० ३ । ६० । ५ ॥
(इन्द्र) हे इन्द्र ! [ बड़े ऐश्वर्य वाले राजन् ] (वाजवद्भिः) उत्तम अन्न वाले (ऋभुभिः)
ऋभुओं [ बुद्धिमान् जनों ] के साथ (समृक्षितं सुतं सोमम्) यथाविधि सींचे हुए और
उत्पन्न किये हुए ऐश्वर्य को (गभस्त्योः) [ हमारे ] दोनों हाथों में (आ वृषस्व) सब
ओर से बरसा। ( मघवन् ) हे बड़े धन वाले ! (धिया इषितः) बुद्धि से प्रेरित तू
(दाशुषः गृहे) दानी के घर में (सौधन्वनेभिः) बड़े बड़े धनुर्धारी वा विज्ञानी
(नृभिः सह) नेताओं के साथ (मत्स्व) आनन्द कर ॥
२-इन्द्रावरुणा सुतपाविमं सुतं सोमं पिबतं मद्यं धृतव्रतौ । युवो रथो अध्वरो
देववीतये प्रति स्वसरमुपयातु पीतये-अथ० ७ । ५८ । १ । ऋ० ६ । ६८ । १० ॥
(सुतपौ) हे पुत्रों की रक्षा करने वाले ! (धृतव्रतौ) उत्तम कर्मों के धारण करने वाले
(इन्द्रावरुणा) बिजुली और वायु [ के समान राजा और प्रजा जन ] ( इमं सुतम् ) इस
पुत्र को ( मद्यम् ) आनन्ददायक ( सोमम् ) -ऐश्वर्य- [ वा बड़ी-बड़ी ओषधियों का रस ]
(पिबतं=पाययतम् ) पान कराओ । (युवोः) तुम दोनों का (अध्वरः) मार्ग
बताने वाला (रयः) विमान आदि यान (देववीतये) दिव्यपदार्थों की प्राप्ति के लिए
गुणकीर्तनम् (अर्हते) योग्याय (जातवेदसे) जातानामुत्पन्नानां वेत्रे (मम् )
सम्यक् (महेम) पूजयेम। सत्कुर्याम (मनीषया) प्रज्ञया (जगत्ग्रासाहै) षह
मर्षंणे तृप्तौ च-अच्, टाप् । आर्षो दीर्घयकारलोपौ। जगतः संसारस्य प्राप्ताहायै ।
प्रकृष्टसहायतायै तृप्तये ( जागतम् ) जगते संसाराय हितम् ( समष्ट्यै )
सम्प्राप्तये । संसिद्धये ॥