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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

Page 354 of 600

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Page 354

३१६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० २ । क० ६ ॥
( बहुधा विश्रुतः मखः छिन्नभिन्नः अपध्वस्तः यजमानस्य इष्टापूर्तद्रविणम्
अवगृह्य अपतत् । १ । ) बहुत प्रकार से विख्यात यज्ञ छिन्न भिन्न और नष्ट होकर यजमान
के इष्ट [ अग्निहोत्र वेदाध्ययन आतिथ्य आदि ] और पूर्त [ वावड़ी कुआं देवमन्दिर आदि ]
के वल को छीन कर गिर जाता है ॥ १ ॥
( संवत्सरविरिष्टं तत् ऋत्विजां च राज्ञः जनपदस्य च विनाशाय यत्र
यज्ञः विरिष्यते । २ । ) संवत्सर यज्ञ से नष्ट किया हुआ कर्म वहां पर ऋत्विजों के और
राजा और राज्य के विनाश के लिये [ होता है ], जहां यज्ञ नष्ट किया जाता है ॥ २ ॥
( दक्षिणाप्रवणीभूतः यज्ञः दक्षिणतः स्मृतः, ब्रह्मवेदात् असंस्कृतः हीनाङ्गः
रक्षसां भागः । ३ । ) दक्षिणाओं से विस्तारित यज्ञ वृद्धि वाला कहा गया है, ब्रह्मवेद
[ ईश्वर ज्ञान ] से नहीं संस्कार किया हुआ, अङ्गों से हीन [ यज्ञ ] राक्षसों [ उपद्रवी
जीवों ] का भाग होता है ॥ ३ ॥
( चातुहौत्रविनिर्मितः, चतुर्विधैः मन्त्रैः, वेदपारगैः ऋत्विग्भिः स्थितः
सकलः यज्ञः चतुष्पात् । ४ । ) चारों होताओं [ होता, अध्वर्यु, उद्गाता, और ब्रह्मा ]
से रचा गया, चार प्रकार वाले मन्त्रों और वेदों के पार पाने वाले ऋत्विजों के साथ ठहरा
हुआ सम्पूर्ण यज्ञ चार पांव वाला होता है ॥ ४ ॥
( प्रायश्चित्तैः अनुध्यानैः अनुज्ञानानुमन्त्रणैः होमैः च सत्रं यज्ञविभ्रंशं ब्रह्मा
प्रपूरयेत् इति । ५ । ) प्रायश्चित्तों [ पापशोधन उपायों ], अनुकूल ध्यानों, अनुज्ञानों
[ अनुकूल आज्ञाओं ] के अनुमन्त्रण [ अनुकूलसम्मतिदान ] से और होमों से सब यज्ञ के
दोष को ब्रह्मा पूरा करे ॥ ५ ॥
( तस्मात् यजमानः भृग्वङ्गिरोविदम् एव तत्र ब्रह्माणं वृणीयात् ) इसलिये
यजमान भृगु अङ्गिराओं [परिपक्व ज्ञान वाले चार वेद] को जानने वाले को ही वहां [यज्ञ में]
ब्रह्मा चुने । ( सः हि यज्ञं तारयति इति ब्राह्मणम् ) वह ही यज्ञ को तार देता है—यह
ब्राह्मण [ ब्रह्मज्ञान ] है ॥ ५ ॥
भावार्थः—जहां पर सब ऋत्विज् लोग चतुर होते हैं और विशेष करके ब्रह्मा
चतुर्वेदी, ब्रह्मचारी, और सब विधान जानने वाला होता है, वह यज्ञ निर्विघ्न सिद्ध होकर
सब राजा और प्रजा को सुख देता है ॥ ५ ॥
विशेषः- इस कण्डिका को गो० पू० २ । २४ से मिलाओ ॥
कण्डिका ६ ॥
यज्ञो वै देवेभ्य उदक्रामत्, न वोहमन्नं भविष्यामीति । नेति देवा अब्रुवन्,
अन्नमेव नो भविष्यसीति । तं देवा विमेथिरे । स एभ्यो विहृतः न प्रबभूव । ते
होचुर्देवाः, न वै न इत्थं विहृतः अलं भविष्यति हन्तेमं संभरामैति१ । तं संश्च-
जह्रुः । तं सम्भृत्योचुरश्विनौ, इमं भिषज्यतमिति । अश्विनौ वै देवानां भिष-
१. सम्भरामीति पू. सं. पाठः ॥ सम्पा० ॥