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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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Page 351

गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० ५ ३१३
प्रकार बढ़ता है, अभीष्ट धन और अभीष्ट सुन्दर पदार्थ अन्न के लिये और ऐश्वर्य के लिये
भले प्रकार हों, सत्यवादियों के लिये सत्य व्यवहार और अन्न हो, प्रकाशमान विस्तृत
परमेश्वर के लिये नमस्कार [ आदर क्रिया ] होवे—यह [ मन्त्र भाग वह कहता है ], प्रकाश
और भूमि के हित के लिये ही [ परमात्मा को ] नमस्कार करके इस लोक में वह प्रतिष्ठा
पाता है, प्रतिष्ठा पाता है [ अवश्य ही बड़ाई पाता है ] ॥ ४ ॥
भावार्थ:--मनुष्यों को चाहिये कि ओषधियों के अंश अंश का गुण जानें और उनसे
ठीक ठीक उपयोग लेकर धन प्राप्त करके सुखी रहें ॥ ४ ॥
विशेष: १-इस कण्डिका में भी कं० ३ के समान यजुर्वेद अध्याय ५ मन्त्र ७ के प्रतीक
कुछ भेद से दिये हैं, वह मन्त्र अर्थ सहित दिया जाता है, जिससे पद और आशय मिलाने में
सुगमता होवे । ( अंशुं,शुरछं,शुष्टे देव सोमाप्यायतामिन्द्रायैकधनविदे । आ
तुभ्यमिन्द्रः प्यायतामा त्वमिन्द्राय प्यायस्वा ध्याययास्मान्त्सखीन्त्सन्ध्या मेधया
स्वस्ति ते देव सोम सुत्यामशीय । एष्टा रायः प्रेषे भगाय ऋतमृतवादिभ्यो नमो
द्यावापृथिवीभ्याम् ॥ य० ५ । ७ ) ( देव ) हे दिव्य गुण वाले ( सोम ) ऐश्वर्यवान्
पुरुष वा औषध ! ( ते ) तेरा ( अंशुः-अंशुः ) अङ्ग अङ्ग ( एकधनविदे ) एक धर्म से
धन पाने वाले ( इन्द्राय ) बड़े ऐश्वर्य वाले पुरुष के लिये ( आ प्यायताम् ) अच्छे प्रकार
बढ़े, ( तुभ्यम् ) तेरे लिये ( इन्द्रः ) बड़े ऐश्वर्य वाला पुरुष ( आ प्यायताम् ) अच्छे
प्रकार बढ़े, ( त्वम् ) तू (इन्द्राय ) बड़े ऐश्वर्य वाले के लिये ( आ प्यायस्व ) भले
प्रकार बढ़ । ( अस्मान् सखीन् ) हम मित्रों को ( सन्त्या ) ठीक ठीक ले चलने वाली
( मेधया ) धारणावती बुद्धि से ( आ प्यायय ) तू भले प्रकार बढ़ा । ( देव ) हे दिव्य
गुण वाले ( सोम ) प्रेरक पुरुष ( ते स्वस्ति ) तेरे लिये कल्याण हो । ( सुत्याम् )
तत्त्व निचोड़ने की क्रिया को ( अशीय ) मैं प्राप्त होऊं । ( आ-इष्टा रायः ) अनेक
अभीष्ट धन [ होवें ], ( ऋतवादिभ्यः ) सत्यवादी पुरुषों को ( इषे ) अन्न के लिये
और ( भगाय ) ऐश्वर्य के लिए ( द्यावापृथिवीभ्याम् ) प्रकाश और भूमि से ( ऋतम् )
सत्यज्ञान और ( नमः ) अन्न वा सत्कार ( प्र ) अच्छे प्रकार [ होवे ] ॥
विशेष: २-इस कण्डिका को ऐतरेय ब्राह्मण १ । २६ से मिलाओ ॥
विशेष: ३-निम्नलिखित शब्द शोधे गये हैं—
अशुद्ध शुद्ध प्रमाण
आस्येतत् अस्यैतत् सायण भाष्य ऐ० ब्रा० १ । २६
अंशुरछंसुष्टे अंशुं,रछं,शुष्टे यजुर्वेद ५ । ७ और ऐ० ब्रा०
आत्ममिन्द्राय आ त्वमिन्द्राय १ । २६
सन्धा सन्त्या सन्त्या वेद में दोनों पाठ हैं
कण्डिका ५ ॥
मख इत्येतद् यज्ञनामधेयं, छिद्रप्रतिषेधसामर्थ्यात् । छिद्रं खमित्युक्तं, तस्य
मेति प्रतिषेधः, मा यज्ञं छिद्रं करिष्यतीति । छिद्रो हि यज्ञो भिन्न इवोदधिर्विस्स्र-
वति । तद्ध खलु छिद्रं भवति, ऋत्विग्यजमानविमानाद्वापि वैषां व्यपेक्षया मन्त्र-