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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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Page 344

३०६ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० २
ह वै यमः अमुष्मिन् लोके आध्नोत्, पितृलोके एव आध्नोति) सुवर्ण चाहने वाला पुरुष
यम [ वायु ] देवता वाले शुक [ सुग्गा पक्षी ] और शठ [ प्रशंसनीय ] घोड़े को अच्छे
प्रकार प्राप्त करे, मैं चलने वाला [ पुरुषार्थी ] प्रसिद्ध हूं, जो पितृलोक [ माता पिता आदि
पालक विद्वानों की सभा ] में रहूं—इस [ मन्त्र ] से ही यम [ संयमी, जितेन्द्रिय पुरुष ]
उस लोक [ दूर देश ] में समृद्ध होता है, वह पितृलोक में ही समृद्ध होता है । ( प्रजाकामः
त्वाष्ट्रं वडवम् आलभेत ) प्रजायें चाहने वाला पुरुष त्वष्टा [ सूक्ष्मकर्ता परमात्मा ]
देवता वाले, बल पहुंचाने बाले पराक्रम को अच्छे प्रकार प्राप्त होवे । ( प्रजाः
सिसृक्षमाणः सः प्रजापतिः वै द्वितीयं मिथुनम् अन्वाविन्दत् ) प्रजाओं को उत्पन्न करने
की इच्छा करते हुए उस प्रजापति ने दूसरे जोड़े को प्राप्त किया । ( सः त्वाष्ट्रं वडवम्
अपश्यत्, त्वष्टा हि रूपाणां प्रजनयिता, तेन प्रजाः असृजन्, तेन मिथुनम्
अविन्दत् ) उसने त्वष्टा देवता वाले, बल पहुँचाने वाले पराक्रम को देखा, त्वष्टा [ सूक्ष्म
बनाने वाला परमात्मा ] ही रूपों को उत्पन्न करने वाला है, उससे प्रजायें उत्पन्न हुए, उससे
उसने जोड़े को पाया । (प्रजावान् मिथुनवान् भवति, यः एवं वेद यः च एवं विद्वान् एतम्
आलभते ) वह उत्तम प्रजाओं वाला और उत्तम मिथुन [ जोड़ों पुत्र पुत्रियों ] वाला होता
है, जो ऐसा जानता है, और जो ऐसा विद्वान् इस [ यज्ञ ] को अच्छे प्रकार प्राप्त होता है ।
( एषः वै काम्यान् योनीन् पशून् आलभते, ऐन्द्राग्नेन तु काम्यं योनिः१ पशुम्
आलभन्ते इष्ट्वा अ'लम्भः .मृद्ध्यै ) वह ही पुरुष चाहने योग्य योनियों [ घरों ] और
पशुओं को अच्छे प्रकार प्राप्त होता है, और इन्द्र और अग्नि [ प्राण और अपान ] देवता
वाले यज्ञ से चाहने योग्य घर और पशु को वे अच्छे प्रकार प्राप्त होते हैं और यज्ञ करके
[ उनका ] आरम्भ [ उद्यम ] समृद्धि के लिये होता है ॥ १ ॥
भावार्थ :—मनुष्य को योग्य है कि सुग्गे के समान अन्तरिक्षगामी और अश्व के
समान भूगामी होकर न्यून से न्यून छठे छठे महीने यज्ञ करके अपनी अनेक प्रकार की उन्नति
की जांच करके उचित व्यवहार करे ॥ १ ॥
कण्डिका २ ॥
पञ्चधा वै देवा व्युदक्रामन्२, अग्निर्र्वसुभिः, सोमो रुद्रैः, इन्द्रो मरुद्भिः,
वरुण आदित्यैः, बृहस्पतिर्विश्वैर्देवैः । ते देवा अब्रुवन्, असुरेश्यो वा इदं भ्रातृव्येभ्यो
( शठम्.) शठ हिंसायां श्लाघायां च · अच् । श्लाघ्यम् ( वा ) चार्थे ( अयःकामः )
सर्वधातुभ्योऽसुन् ( उ० ४ । १८९ ) इण् गतौ—असुन् । अयः, हिरण्यनाम—निघ०
१ । २ । सुवर्णેચ્છुकः ( एता ) इण् गतौ—तृच् । गमनशीलः ( यमः ) संयमी पुरुषः
( आध्नोत् ) समृद्धो भवति (त्वाष्ट्रम्) त्वष्टा तनूकर्ता परमात्मा । त्वष्टृदेवताकम्
( वडवम् ) वल+वा गतौ—कः । बलप्रापकं पराक्रमम् ( सिसृक्षमाणः ) स्रष्टु-
मिच्छन् ( मिथुनवान् ) पुत्रपुत्रीवान् ( योनीन् ) गृहनाम—निघ० ३ । ४ । (योनिः)
योनिम् । गृहम् ( तु ) समुच्चये ( आलम्भः ) आरम्भः । उद्यमः ॥
१. ‘योनिः दृष्ट्वा’ इस पदच्छेद के अनुसार कण्डिका का पाठ योनिरिष्ट्वा होना चाहिये ॥
२. पू सं. व्युत्क्रामन् इति पाठः ॥ सम्पा० ॥