गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
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Read in contextगोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० ५ २७१
स्वाहा। इदमग्नये जातवेदसे--इदं न मम। ४। हवनमन्त्राः ]। (परिधीन् सम्माष्टि
पुन.ति एव ) वह परिधियों को स्वच्छ करता है और शोधता भी है। ( एनान्
सकृत् सकृत् सम्माष्टि ) वह इन [परिधियों] को एक एक बार स्वच्छ करता है
[ जैसे यह चार मन्त्र-ओम्। अदितेऽनुमन्यस्व ॥ १॥ ओम्। अनुमतेऽनुमन्यस्व ॥ २ ॥
ओम्। सरस्वत्यनुमन्यस्व ॥ ३ ॥ ओम्। देव सवितः प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञपतिं भगाय।
दिव्यो गन्धर्वः केतपूः केतं नः पुनातु वाचस्पतिर्वाचं नः स्वदतु ॥ ४ ॥ यजु० ११ । ७ तथा
३० । १ । हवनमन्त्राः ]। ( पराङ् एव हि एतर्हि यज्ञः चतुः सम्ऋध्यते ) उत्कर्ष को
पाया हुआ ही अब यज्ञ चार वार बढ़ता है। (अथो चतुष्पादः पशवः, पशूनाम् आप्त्यै
देव सवितः एतत् ते प्राह इति ) फिर चार पांव वाले पशु हैं, पशुओं के लाभ के लिये--
देव सवितः-यह [ ऊपर लिखा मन्त्र ] तुझ [ ब्रह्मा ] से वह [ यजमान ] बोलता है।
( आह प्रसूत्यै बृहस्पतिः ब्रह्मा इति ) वह कहता है-प्रेरणा [ यज्ञ की बढ़ती ] के लिये
बृहस्पति ब्रह्मा है [ बड़ी विद्याओं का स्वामी प्रधान ऋत्विज है। देव सवितः-इस मन्त्र
में प्रसुव पद और प्रसूत्यै पद षू प्रेरणे धातु से बने हैं ] । ( आह सः हि ब्रह्मिष्ठः, सः यज्ञं
पाहि, सः यज्ञपतिं पाहि, सः माम् पाहि, सः मां पाहि, सः मां कर्मण्यं पाहि इति
यज्ञ य, यजमानाय च, पशूनाम् आप्त्यै च आह ) वह [ यजमान ] कहता है-वह तू
ही अतिशय ब्रह्मज्ञानी है, वह तू यज्ञ की रक्षा कर, वह तू यज्ञपति की रक्षा कर, वह तू मेरी
रक्षा कर, वह तू मेरी रक्षा कर, वह तू मुझ कर्मकुशल की रक्षा कर,-वह यह यज्ञ के हित
के लिये और यजमान के हित के लिये और पशुओं की प्राप्ति के लिये कहता है ॥ ४ ॥
भावार्थः-मनुष्यों को यज्ञ विधान पूर्वक करना चाहिये ॥ ४ ॥
कण्डिका ५ ॥
न वै पौर्णमास्यां नामावास्यायां दक्षिणा दीयन्ते य एष ओदनः पच्यते
दक्षिणैषा दीयते यज्ञस्यर्ध्या इष्टी वा एतेन यद्यजतेऽथो वा एतेन पूर्त्ती य एष
ओदनः पच्यत एष ह वा इष्टापूर्त्ती य एनं पचति ॥ ५ ॥
कण्डिका ५ ॥ पौर्णमासी और अमावस को दक्षिणा के स्थान में
ओदन का दान ॥
( न वै पूर्णमास्यां न अमावास्यां दक्षिणाः दीयन्ते ) न तो पौर्णमासी
[ इष्टि ] में और न अमावस्या [ इष्टि ] में दक्षिणायें दी जाती है। ( यः एषः ओदनः
पच्यते, एषा दक्षिणा दीयते ) जो यह ओदन [ चावल ] पकाया जाता है यह ही
समिध इति शब्देन युक्तया ऋचा ( पराङ् ) परा उत्कर्षे + अञ्चु गतिपूजनयोः-
क्विन् । उत्कर्षं प्राप्तः ( चतुः ) चतुर्वारम् ( चतुष्पादः ) चतुष्पादयुक्ताः
( आप्त्यै ) प्राप्तये ( प्रसूत्यै ) प्रेरणायै । उन्नतये ( कर्मण्यम् ) कर्मकुशलम् ॥
५-( ऋध्यै ) वृद्धये ( इष्टी ) इयाडियाजीकाराणामुपसंख्यानम् ( वा०
पा० ७ । १ । ३९ ) इति विभक्तेः ईकारः । इष्टम् । अग्निहोत्रवेदाध्ययनातिथ्यादि-