गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
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Read in context२६८ गोपथब्राह्मणे उत्तरभागे प्र० १ । क० ३ ॥
सम्पूर्ण ब्रह्मज्ञान से खावे, इसलिये इसको वह न मारे। (तस्मात् यः ब्रह्मिष्ठः स्यात् तं
ब्रह्माणं कुर्वीत) इसलिये जो अत्यन्त ब्रह्मज्ञान वाला हो, उसको ब्रह्मा बनावे। (बृहस्पतिः
वै सर्वं ब्रह्म) बृहस्पति [बड़ी विद्याओं का स्वामी] ही सम्पूर्ण ब्रह्म [ब्रह्मा] है।
(एतत् सर्वेण ह वै ब्रह्मणा यज्ञं दक्षिणतः उद्यच्छते) इसलिये वह सम्पूर्ण ब्रह्मज्ञान
के साथ यज्ञ को दक्षिण दिशा में बैठकर ऊंचा करता है। (एतस्मात् अपः एव वै प्र णाः
क्रामन्ति) इसलिये जल को ही प्राण प्राप्त करते हैं। (यः आविद्धं प्राश्नाति अद्भिः
प्राणान् मार्जयित्वा संस्पृशते, मे नित्यं वाक् आस्यम् ऋतम्) जो पुरुष अच्छे छेदन
किये हुये [प्राशित्र अन्न] को खाता है, वह जल से प्राणों को शुद्ध करके [इन्द्रिय] स्पर्श
करता है—मेरे लिये नित्य वाणी, मुख और सत्य होवे। [यह वाक्य पढ़ता है। (प्राणाः
वै अमृतम्, आपः प्राणान् एव यथास्थानम् उपाह्वयते) प्राण ही अमृत [जल] हैं,
जल प्राणों [जीवन साधनों] को ही अपने अपने स्थान पर बुलाता है। (तत् उ ह एके
आहुः, इन्द्राय पर्यहरन् इति) सो कोई कोई कहते हैं—इन्द्र [जीवात्मा] को वे [इन्द्रिय
अन्न] लाकर देते हैं। (ते देवाः अब्रुवन् इन्द्रः वै देवानाम् ओजिष्ठः बलिष्ठः तस्मै
एतत् परिहरन्ति इति तत् तस्मै पर्यहरन्) उन देवों [इन्द्रियों] ने कहा—इन्द्र
[जीवात्मा] ही देवों [इन्द्रियों] में अति ओजस्वी [पराक्रमी] और अति बलवान् है,
उसके लिये यह [अन्न] वे लाते हैं—इसलिये उसे उसके लिये वे लाये हैं। (तत् सत्
ब्रह्मणा शमयांचकार) उस होते हुये को ब्रह्मज्ञान से उस [इन्द्र] ने शान्त किया।
(तस्मात् आहुः इन्द्रः ब्रह्मा इति) इसलिये वह कहते हैं—इन्द्र [जीवात्मा] ब्रह्मा है।
(यवमात्रं भवति यवमात्रं वै विषस्य न हिनस्ति) वह [इन्द्र] जौ के आकार वाला
[परमाणु रूप] है, जौ के आकार वाला जल का नाश नहीं करता है। (यत् अधस्तात्
अभिघारयति तस्मात् प्रक्षरणम् अधस्तात् प्रजाः अरुः न हिनस्ति) जो वह नीचे की
ओर सींचता है, इसलिये बहाव नीचे की ओर प्रजाओं [इन्द्रियों] को मर्म में न नष्ट
करता है। (यत् उपरिष्टात् अभिघारयति तस्मात् प्रक्षरणम् उपरिष्टात् प्रजाः अरुः
न हिनस्ति) जो वह ऊपर की ओर सींचता है, इसलिये बहाव [रुधिर रूप जल] ऊपर
की ओर प्रजाओं [इन्द्रियों] को मर्म में नहीं नष्ट करता है। (यत् उभयतः अभिघारयति
उभयतः अभिघारि प्रजाः अरुर्घातुकं स्यात्) जो वह दोनों ओर से [आमने सामने
लुक् । व्योमन् व्यवने—निरु० १२ । ४० । विविधरक्षस्थाने (ब्राह्मणा) ब्रह्मज्ञानेन
(ब्रह्मिष्ठः) अतिशयेन ब्रह्मज्ञानवान् । (दक्षिणत) दक्षिणस्यां दिशि स्थितः
(उद्यच्छते) उत्+यम नियमे। उन्नयते (क्रामन्ति) गच्छन्ति। प्राप्नुवन्ति
(मार्जयित्वा) शोधयित्वा (अमृतम्) उदकम्—निघ० १ । १२ । (आपः)
जलम् (इन्द्राय) परमेश्वर्यवते। जीवात्मने (देवाः) इन्द्रियाणि (ओजिष्ठः)
अतिशयेन ओजस्वी पराक्रमी (यवमात्रम्) अणुपरिमाणम् (विषस्य) उदकम्—
निघ० १ । १२ । (अभिघारयति) घृ क्षरणदीप्त्योः—सर्वतः सिञ्चति प्रवहति
(प्रक्षरणम्) प्रवहणम्। (अरुः) अर्त्तिपूपिव्यजि० (उ० २ । ११७) ऋ गतौ
हिंसने च—उसिः । अरूंषि । मर्मणि (अभिघारि) सर्वतः सेचकं जलम्