गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
DevanagariSanskritpublished600 pages
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Read in contextPage 270२३२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ५। क० १०॥
२३२ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ५। क० १०॥
यज्ञ करे। (ततः सहस्रसंवत्सरस्य एतं तापश्रितम् आञ्जस्यम् अपश्यन् ते हि एव
स्तोमाः भवन्ति तानि पृष्ठानि तानि शस्त्राणि ) फिर उन्होंने सहस्र संवत्सर के इस
तप से जाने गये गति व्यवहार को देखा, वे ही स्तोम, वे ही पृष्ठ, वे ही शस्त्र हैं। ( सः खलु
द्वादशमासान् दीक्षाभिः एति, द्वादशमासान् उपसद्भिः, द्वादशमासान् सुत्याभिः )
वह [ यजमान ] निश्चय करके बारह महीनों को दीक्षाओं से पाता है, बारह महीनों को
उपसदों [ उपासना यज्ञों ] से, और बारह महीनों को सुत्याओं [ सोम निचोड़ने की
क्रियाओं ] से । ( अथ यत् द्वादशमासान् दीक्षाभिः एति द्वादशमासान् उपसद्भिः तेन
एतौ अग्न्यकों आप्नोति, अथ यत् द्वादशमासान् सुत्याभिः, तेन इदं महत् उक्थ्यम्
अवाप्नोति २) फिर जब वह बारह महीनों को दीक्षाओं से पाता है और बारह महीनों
को उपसदों से, उससे इन अग्नि और सूर्य [ के बल ] को पाता है, और जब बारह महीनों
को सुत्याओं [ सोम निचोड़ने की क्रियाओं ] से [ पाता है ], उससे इस बड़े उक्थ्य
[ प्रशंसनीय व्यवहार ] को पाता है। २। ( ते देवाः इह सामिवासुः तं यज्ञक्रतुम् उप-
जानीमः यः सहस्रसंवत्सरस्य प्रतिमा, कः हिं तस्मै मनुष्यः यः सहस्रसंवत्सरेण
यजेत इति ) वे विद्वान् लोग इस पर व्याकुलता में रहने वाले [ हुये ] उस यज्ञ कर्म को
हम जान लेवें जो सहस्रसंवत्सर का स्थानापन्न है, कौन सा वह मनुष्य है जो सहस्रसंवत्सर
से यज्ञ करे। ( ततः एतं संवत्सरं तापश्रितम् आञ्जस्यम् अपश्यन् ते हि एव
स्तोमाः भवन्ति तानि पृष्ठानि तानि शस्त्राणि ३ ) फिर उन्होंने इस संवत्सर के तप
से जाने गये गति व्यवहार को देखा, वे ही स्तोम, वे ही पृष्ठ और वे ही शस्त्र हैं। ३ ।
( ते देवाः इह सामिवासुः तं यज्ञक्रतुम् उपजानीमः यः सहस्रसंवत्सरस्य प्रतिमा,
कः हि तस्मै मनुष्यः यः सहस्रसंवत्सरेण यजेत इति ) वे विद्वान् लोग इस पर
व्याकुलता में रहने वाले [ हुये ] उस यज्ञकर्म को हम जान लेवें जो सहस्रसंवत्सर का
स्थानापन्न है, कौन सा वह मनुष्य है जो सहस्रसंवत्सर से यज्ञ करे। ( ततः एतं द्वादशाहं
संवत्सरस्य आञ्जस्यम् अपश्यन् ते हि एव स्तोमाः भवन्ति तानि पृष्ठानि तानि
शस्त्राणि ) फिर उन्होंने इस द्वादशाह [ बारह दिन वाले [ संवत्सर के गति व्यवहार को
देखा, वे ही स्तोम, वे ही पृष्ठ और वे ही शस्त्र हैं। ( सः खलु द्वादशाहं दीक्षाभिः एति,
द्वादशाहम् उपसद्भिः, द्वादशाहं सुत्याभिः ) वह [ यजमान ] द्वादशाह यज्ञ को दीक्षाओं
से पाता है, द्वादशाह को उपसदों से और द्वादशाह को सुत्याओं से । ( अथ यत् द्वादशाहं
वैकल्ये निवासिनः, बभूवुः इति शेषः ( यज्ञक्रतुम् ) यज्ञकर्म ( प्रतिमा ) स्थाना-
पन्नः ( तस्मै ) चतुर्थी प्रथमायाः। सः ( अयातयाममध्ये ) अनष्टयोग्यसमय-
'मध्ये ( अयातयाम्यम् ) उचितसमयेनाशराहित्यम् ( आपेदे ) यजमानः प्राप्तवान्
( व्युष्टिः ) वि+वस निवासे यद्वा उषवधे दाहे च-क्तिन्। दीप्तिः। प्रकाशः
( ऋचि ) स्तुत्यविद्यायाम् ( यजुषि ) संगतिकरणविद्यायाम् ( साम्नि ) मोक्ष-
विद्यायाम् ( शान्ते ) शान्तिविद्यायाम् ( घोरे ) भयानकविद्यायां पापनाशाय
( श्रौषट् ) श्रु श्रवणे-डौषट्। व्याहृतिविशेषः ( वौषट् ) वह प्रापणे-डोषट ।