गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
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Read in contextगोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ५ । क० ४ २१९
[ मनुष्य ] का यह प्रातःसवन, यह माध्यन्दिन सवन और यह तीसरा सवन [सं० १] विराट्
[ दस अक्षर के चार पाद वाले विराट् छन्द ] के स्थान में है, अन्न और श्री [ लक्ष्मी वा
शोभा ] ही विराट् है, खाने योग्य अन्न और श्री की प्राप्ति के लिये यह है, इसलिये यह
[ विराट् ] इन [ गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती और पङ्क्ति ] में अति श्रेष्ठ है । ५ । ( तस्य
इदं प्रातःसवनम् इदं माध्यन्दिनं सवनम् इदं तृतीयसवनम् अतिछन्दसाम् आयतने,
अतिछन्दः वै छन्दसाम् आयतनम्, तस्मात् इदं प्रतिष्ठं फलकम् ६ ) उस [ मनुष्य ]
का यह प्रातःसवन, यह माध्यन्दिन सवन, यह तीसरा सवन [ सं० १ ] अतिछन्दों
[ अतिजगती, शक्वरी, अतिशक्वरी, अष्टि, अत्यष्टि, धृति, अतिधृति अतिछन्दों ] के
स्थान में है, अतिछन्द ही छन्दों का स्थान है, इसलिये यह प्रतिष्ठा वाला प्रतिफल है । ६ ।
( तस्य इदं प्रातःसवनम्, इदं माध्यन्दिनं सवनम्, इदं तृतीयं सवनं सैतः, सैतः
अभिप्लवः, सैतः आत्मा पृष्ठ्यः, प्लवति इव अभिप्लवः, तिष्ठति इव पृष्ठ्यः,
प्लवते इव हि एवम् अङ्गैः, तिष्ठति इव आत्मना ७ ) उस [ मनुष्य ] का यह
प्रातःसवन, यह माध्यन्दिन सवन और यह तीसरा सवन [ सं० १ ] खेती से सिद्ध हुआ
यज्ञ है, खेती से सिद्ध हुआ यज्ञ अभिप्लव है, खेती से सिद्ध हुआ यज्ञ आत्मा रूप पृष्ठ्य है,
चलता है जैसे यह अभिप्लव यज्ञ है, ठहरता है जैसे यह पृष्ठ्य है, क्योंकि वह [ यज्ञ ]
चलता है जैसे इस प्रकार अङ्गों से, और ठहरता है जैसे आत्मा से । ७ । ( तस्य दक्षिणः
कर्णः अयम् एव अभिजित् ) उस [ मनुष्य ] का दाहिना कान यही अभिजित् यज्ञ है ।
( तस्य अक्ष्णः यत् दक्षिणं शुक्लं सः प्रथमस्वरसामा यत् कृष्णं सः द्वितीयः, यत्
मण्डलं सः तृतीयः ) उस [ मनुष्य ] के आंख का जो दाहिना श्वेतपन है वह पहिला
स्वरसाम यज्ञ है, जो कालापन है वह दूसरा, और जो मण्डल [ आंख का घेरा ] है वह
तीसरा [ स्वरसाम ] है । ( नासिके विषुवान् ) दोनों नथने विषुवान् यज्ञ हैं । ( मण्डलम्
एव प्रथमः अर्वाक् स्वरसामा यत् कृष्णं सः द्वितीयः, यत् शुक्लं सः तृतीयः )
मण्डल [ वाएं आंख का घेरा ] ही पहिला अर्वाक् स्वरसाम यज्ञ है, जो कालापन है वह
दूसरा है और जो श्वेतपन है वह तीसरा है । ( तस्य सव्यः कर्णः अयं विश्वजित् ) उस
[ मनुष्य ] का बांयां कान यह विश्वजित् है । ( उक्तौ पृष्ठ्याभिप्लवौ ) दोनों पृष्ठ्य
और अभिप्लव कह दिये हैं । ( यौ अर्वाञ्चौ प्राणौ ते गवायुषी ) जो नीचे वाले दो
प्राण [ पायु और उपस्थ ] हैं वे दो गवायुषी यज्ञ हैं । ( अङ्गानि दशरात्रः मुखं
महाव्रतम् ) शेष अङ्ग दशरात्र और मुख महाव्रत है । ( तस्य उदानः एव उदयनीयः
अतिरात्रः ) उस [ मनुष्य ] का उदान [ ऊपर चढ़ने वाला वायु ] ही उदयनीय
अतिरात्र यज्ञ है । ( उदानेन हि उद्यन्ति यः एवं वेद ) क्योंकि वह उदान वायु से
वि + राजृ दीप्तौ ऐश्वर्य्ये च-क्विप् । विविधदीप्यमाना । विविधैश्वर्ययुक्ता ।
छन्दोविशेषः ( अतिछन्दसाम् ) अतिजगत्याद्यतिछन्दसाम् ( प्रतिष्ठम् ) प्रति-
ष्ठायुक्तम् ( फलकम् ) स्वार्थे कन् । फलम् । प्रतिफलम् ( सैतः ) तेन निर्वृत्तम्
( पा० ४ । २ । ६८ ) सीता-अण् । सीतया कृषिकर्मणा निष्पादितो यज्ञः ( अक्ष्णः )
नेत्रस्य ( मण्डलम् ) मडि भूषणे-कलच् । चक्राकारेण वेष्टनम् ॥