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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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Page 234

१६६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ४ । क० १२ ॥
जानता है वह ठहरता है। (प्रजया पशुभिः प्रतितिष्ठति यः एवं वेद) वह प्रजा के
साथ और पशुओं के साथ प्रतिष्ठा पाता है जो ऐसा जानता है। (सः वै एषः संवत्सरः)
सो यही संवत्सर है ॥ ११ ॥
भावार्थः—मनुष्य संवत्सर [यथावत् बसाने वाले काल] को बाहिर और भीतर
से ठीक ठीक काम में लाने से संसार में यश पाता है ॥ ११ ॥
कण्डिका १२ ॥
स वा एष संवत्सरो बृहतीमभिसम्पन्नो द्वावक्षरावह्नां षडहो द्वौ पृष्ठचा-
भिलवो गवायूषी दशरात्रस्तथा खलु षट्त्रिंशत् सम्पद्यन्ते षट्त्रिंशदवदाना गौः
षट्त्रिंशदक्षरा बृहती बार्हतो वै स्वर्गो लोको बृहत्या वै देवाः स्वर्गे लोके यजन्ते
बृहत्या' स्वर्गे लोके प्रतिष्ठति प्रतितिष्ठति प्रजया पशुभिर्य एवं वेद स वा एष
संवत्सरः ॥ १२ ॥
कण्डिका १२ ॥ संवत्सर की बृहती छन्द से
उपमा और महिमा ॥
(सः वै एषः संवत्सरः बृहतीम् अभिसंपन्नः) सो यही संवत्सर बृहती
[छन्द] से यथावत् मिला हुआ है-(द्वौ अक्षरो अह्नां षडहः द्वौ पृष्ठचाभिपॢवो
गवायूषी दशरात्रः) दो अक्षर (अह्नाम्) बहुत दिन वाले यज्ञों में (षडहः) छह
दिन वाला यज्ञ है, दो पृष्ठ्य और अभिप्लव तथा गवायूषी [गो और आयु यज्ञ]
(दशरात्रः) दश रात्रि वाला यज्ञ है। (तथा खलु षट्त्रिंशत् सम्पद्यन्ते) इस प्रकार
से ही वे छत्तीस [ ? ? ] बनते हैं [षडह, पृष्ठ्य और अभिप्लव तथा गवायूषी और
दशरात्र वा दाशरात्रिक पदों के लिये देखो कण्डिका ६, १०]। (षट्त्रिंशदवदाना गौः
षट्त्रिंशदक्षरा बृहती) छत्तीस खण्ड वाली गौ है [और गौ के समान] छत्तीस अक्षर
वाला बृहती छन्द [वेदवाणी] है। (बार्हतः वै स्वर्गः लोकः) बृहती [वेदवाणी]
वाला ही स्वर्ग है। (बृहत्या वै देवाः स्वर्गे लोके यजन्ते) बृहती [वेदवाणी] के
द्वारा देवता [विद्वान् लोग] स्वर्ग लोक में पूजे जाते हैं। (बृहत्याः स्वर्गे लोके
प्रतिष्ठति, प्रजया पशुभिः प्रतितिष्ठति यः एवं वेद) बृहती [वेदवाणी] से स्वर्ग
लोक में वह ठहरता है और प्रजा के साथ और पशुओं के साथ वह प्रतिष्ठा पाता है जो
ऐसा जानता है। (सः वै एषः संवत्सरः) सो यही संवत्सर है ॥ १२ ॥
भावार्थः—वेदवाणी द्वारा संवत्सर के सुप्रयोग से मनुष्य प्रतिष्ठा पावे ॥ १२ ॥
विशेषः—इस कण्डिका का मिलान करो गो० पू० ३ । १८ तथा ४ । ६, १० ॥
१२—(अभिसंपन्नः) सम्यग् युक्तः (बृहती) वाक् । वेदवाणी छन्दोभेदः
(बार्हतः) बृहत्यो—अण् । बृहत्या वेदवाण्या सम्बद्धः ॥