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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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पूर्वं गोपथ ब्राह्मण भाष्य का सम्पादन हो फलतः कार्य प्रारम्भ कर दिया गया किन्तु मेरे
बार-बार बाहिर जाने एवं विद्यालयीय कार्यों में अनिवार्यतया संलग्न होने के कारण यह
कार्य बड़ी मन्थर गति से चलता रहा । कई प्रतियों के मिलानादि के कारण इसमें पर्याप्त
समय लगाने की आवश्यकता पड़ती थी, ऐसा न होने पर कार्य रुक रुककर ही चलता रहा
पर जैसा कि लक्ष्य प्राप्ति के लिये निरन्तर गति की अनिवार्यता अपेक्षित है मन्दता
तीव्रता तो साधन की शक्ति पर निर्भर है, हम गतिशील रहे अतः परमेश की महती
अनुकम्पा से यह कार्य आज अपने आप में पूर्ण होकर सुधीजनों के समक्ष है। मेरे बाहिर
आदि जाने के कारण प्रकाशन की त्रुटियां रह गई होंगी और हैं इसके लिये मैं सहृदय
पाठकों से यही कहूँगी वे समय-समय पर मेरा ध्यान इस ओर आकृष्ट करते रहें जिन्हें अगले
संस्करण में ठीक किया जा सकेगा। संस्था को चलाते हुये ऐसे समयापेक्षित कार्य करने
कितने कठिन हैं यह कोई भुक्तभोगी ही जान सकते हैं, पुनरपि कार्य भी इसी झपेट में ही
हुआ करते हैं, जीवन में कोई भी महत्त्वाकांक्षी-जन कार्य के लिये सर्वथा शान्ति एवं
अपेक्षित समय नहीं उपलब्ध कर पाते होंगे, ऐसे ही चलता होगा।
प्रकाशन के इस कार्य में श्रद्धेय त्रिवेदी जी के पौत्र डॉ० इन्द्रदयाल जी सेठ एवं
उनकी धर्मनिष्ठा पत्नी डॉ० कीर्त्ति सेठ डी० फिल प्राध्यापिका शिक्षाशास्त्र प्रयाग विश्व-
विद्यालय, पौत्री श्रीमती सुशीला देवी जी जौहरी मू० पू० प्राचार्या भगवानदीन आर्य-
कन्या महाविद्यालय लखीमपुर खीरी तथा प्रदोहित्र श्री अजय कुमार जी जौहरी आदि सभी
का अत्यन्त ही उत्साह रहा है। श्री त्रिवेदी की वंशपरम्परा में तीसरी एवं चौथी पीढ़ी में
भी वैदिक कार्यों के प्रति वही अनुराग वही निष्ठा समाई हुई है यह सौभाग्य की बात है।
श्री त्रिवेदी जी के गहन तप और निष्ठा का ही यह परिणाम है। वस्तुतः आप सभी लोग
इस विषय में कोटिशः बधाई के पात्र हैं।
इस सम्पादन कार्य में यथावसर पाठों के विवेचन एवं कहीं-कहीं कण्डिकाओं के
याज्ञिक अर्थों की सङ्गति में श्री डॉ० युगल किशोर जी मिश्र वेदाचार्य एम० ए०, पी-
एच० डी० ने उदारता पूर्वक समय लगाया है, अतः वे बहुशः धन्यवाद के भागी हैं। मेरे
लघुभ्राता श्री सुद्युम्न एम० ए०, व्याकरणाचार्य, पी एच० डी० प्राध्यापक मु० म०
टाउन डिग्री कॉलेज बलिया ने मेरा कई महत्त्वपूर्ण उपयोगी स्थलों की ओर ध्यान दिलाया
है तदर्थ मैं उनकी आभारी हूँ। ईश्वर करे वे सदैव सुयश के भागी हों। अपनी अनुजा
बहिन मेधा देवी व्याकरणाचार्या के सम्बन्ध में क्या कहूँ कार्य तो सब हमारा मिला-जुला ही
होता है, तथापि वे "नींव की ईंट" बने रहना ही अधिक पसन्द करती हैं अतः बहुत विरोध