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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

Page 194 of 600

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Page 194

१५६ गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ३ । क० १२ ॥
अभ्यवज्वालितम् १३) मरुत् [वायु] देवता वाला औटा हुआ दूध है १३, (पौष्णं
समुद्वान्तम् १४) पूषा [पुष्ट करने वाला सूर्य] देवता वाला उफनता हुआ दूध
है १४, (वारुणं विष्यन्दम् १५) वरुण [जल] देवता वाला बहता हुआ दूध है १५,
(सारस्वतम् अद्भिः प्रत्यानीतम् १६) सरस्वती [जल वाली नदी] देवता वाला
जल से लौटा दिया गया दूध है १६, (त्वाष्ट्रम् उद्वास्यमानम् १७) त्वष्ट्रा [सूक्ष्म
बनाने वाला विद्वान्] देवता वाला छोड़ा जाता हुआ दूध है १७ (धात्रम् उद्वासि-
तम् १८) धाता [सब का धारण करने वाला] देवता वाला छोड़ा हुआ दूध है १८,
(वैश्वदेवम् उन्नीयमानम् १९) विश्वेदेवा [सब दिव्य गुण] देवता वाला ऊपर
लाया जाता हुआ [नवनीत माखन] है १९, (सावित्रम् उन्नीतम् २०) सविता
[सर्वप्रेरक] देवता वाला ऊपर लाया गया नवनीत है २०, (बार्हस्पत्यं प्रक्रम्य-
माणम् २१) बृहस्पति [बड़ी विद्याओं का स्वामी] देवता वाला घुमाया जाता हुआ
नवनीत है २१, (द्यावापृथिव्यं ह्रियमाणम् २२) द्यावापृथिवी [सूर्य और भूमि]
देवता वाला लिया जाता हुआ नवनीत है २२, (ऐन्द्रम् उपसाद्यमानम् २३) इन्द्र
[बड़े ऐश्वर्य वाले] देवता वाला पास लाया जाता हुआ नवनीत है २३, (बलाय
उपसन्नम् २४) बल के लिये पास रक्खा गया नवनीत है २४, (आग्नेयी समित् २५)
अग्नि देवता वाली समिधा है २५, (यां प्रथमाम् आहुतिम् अहौषम् माम् एव तत्
स्वर्गे लोके अधाम् २६) जिस पहिली आहुति को मैंने दिया है, उस से अपने को मैंने
स्वर्गलोक में रक्खा है २६, (यत् गार्हपत्यम् अवेक्षिषम् अस्य लोकस्य संतत्यै २७)
जो मैंने गार्हपत्य अग्नि वाली हवि को विचारा है, वह इस लोक के विस्तार के लिये
है २७, (प्राजापत्या उत्तरा आहुतिः, तस्मात् सा पूर्णतरा मनसा एव २८) प्रजापति
[प्रजापालक ईश्वर वा गृहस्थ] देवता वाली पिछली आहुति है. इस कारण वह मन
के साथ ही अधिक पूर्ण है २८, (यत् हुत्वा उदञ्चम् स्रुचं त्रिः उदनैषं रुद्रान् तेन
अप्रीणाम् २९) जो हवि देकर उत्तर ओर रक्खी हुई स्रुचा [वट के पत्ते के समान रूप
देवताकम् (आश्विनम्) अश्विन्--अण्। अश्विदेवताकम्। अश्विनौ स्त्री-
पुरुषौ। कुहस्विद् दोषा कुह वस्तोरश्विना--ऋ० १०।४०।२ (सौम्यम्)
सोम--टघण् । सोमदेवताकम् । ओषधिः सोमः सुनोतेः--निरु० ११।२
(बार्हस्पत्यम्) बृहस्पति--ण्यः। बृहस्पतिदेवताकम्। बृहस्पतिः। बृहतीनां
विद्यानां पतिः। वाचस्पतिः (वैश्वानरीयम्) वैश्वानर--छः। वैश्वानरदेवता-
कम्। वैश्वानरः सर्वनरहितः (वैष्णवम्) विष्णुदेवताकम्। विष्णुः व्यापको-
ऽग्निः (मारुतम्) मरुत्--स्वार्थे अण्। वायुदेवताकम् (पौष्णम्) पूषन्-
अण्। पूषदेवताकम्। पूषा पोषकः सूर्यः (वारुणम्) वरुणदेवताकम्। वरुणो
जलम् (सारस्वतम्) सरस्वतीदेवताकम् । सरस्वती जलवती नदी (त्वा-
ष्ट्रम्) त्वष्टृदेवताकम् । त्वष्टा सूक्ष्मोकर्ता । विश्वकर्मा (वैश्वदेवम्) सर्व-
दिव्यगुणदेवताकम् (सावित्रम्) सर्वप्रेरकदेवताकम् (ऐन्द्रम्) ऐश्वर्य्य-
वद्देवताकम् (अहौषम्) हुतवानस्मि (माम्) आत्मानम् (अधाम्) धारित-
वानस्मि (प्राजापत्या) प्रजापतिः ईश्वरो गृहस्थो वा, तद्देवताका (रुद्रान्)