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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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Page 189

गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० ३ । क० १० ॥ १५१
इडा = भूमि नामक १, और प्राशित्र [ प्राशन वा ओदन नामक ] २, और जो दो
आग्नीध्रीय [ आग्नीध्र वाली दो आहुति को अग्नि ] खाता है ३, ४, ब्रह्मा का भाग ५,
और प्रति मास अमावस को करने योग्य श्राद्ध वाला यजमान का भाग छठा है ६ । ( अथ
ये उपरिष्टात् अष्टौ आज्यभागाः, त्रयः अनुयाजाः, चत्वारः पत्नीसंयाजाः अष्टमं
समिष्टयजुः ) और जो पिछले आठ आज्य भाग हैं, [ उनमें ] तीन अनुयाज, चार पत्नी
संयाज और आठवां समिष्टयजु है । ( अथ या गायत्री हरिणी ज्योतिष्पक्षा सर्वैः यज्ञैः
यजमानं स्वर्गं लोकं अभिवहति सा वेदिः एव ) और जो गायत्री सुवर्ण मूर्ति, ज्योति
के पंख वाली होकर सब यज्ञों के द्वारा यजमान को स्वर्गलोक में पहुँचाती है. वह वेदी
[ यज्ञ कुण्ड ] ही है । ( तस्य ये पुरस्तात् अष्टौ आज्यभागाः स दक्षिणः पक्षः, अथ
ये उपरिष्टात् अष्टौ आज्यभागाः स उत्तरः पक्षः, हवींषि आत्मा. गार्हपत्यः
जघनम्, आहवनीयः शिरः, सौवर्णराजतौ पक्षौ ) उस [ यजमान ] के जो पहिले
आठ आज्य भाग हैं वह [ वेदी का ] दाहिना पंख है, और जो पीछे वाले आठ
आज्य भाग हैं वह बांया पंख है, सब हवि आत्मा हैं, गार्हपत्य [ अग्नि ] जंघा है,
आहवनीय शिर है, सोने और चांदी वाले दोनों पंख हैं. ( तत् यद् आदित्यं पुरस्तात्
पर्य्यन्तं न पश्यन्ति तस्मात् अज्योतिष्कः उत्तरः भवति ) सो जो सूर्य को पूर्व से
पश्चिम में जाता हुआ नहीं देखते हैं इसलिये बिना ज्योति वाला पिछला [ यज्ञ वा पक्ष ]
होता है । [ अर्थात् सूर्य को अवश्य देखे जिससे ज्योति बढ़े ] । ( अथ या पङ्क्तिः
पंचपदा सप्तदशाक्षरा सर्वैः यज्ञैः यजमानं स्वर्गं लोकम् अभिवहति सा याज्या
इव ) और जो पङ्क्ति पांच पाद वाली सत्रह अक्षर वाली होकर सब यज्ञों के द्वारा
यजमान को स्वर्ग लोक में पहुँचाती है वह याज्या [ नाम वाली इष्टि ] ही है । ( तस्याः
ओं श्रावय इति चतुरक्षरम्, अस्तु श्रौषट् इति चतुरक्षरम्, यज इति द्व्यक्षरं, ये
यजामहे इति पंचाक्षरं, द्व्यक्षरः वै वषट्कारः ) उस [ याज्या ] के ओं श्रावय
[ ओम् को तू सुना ] यह चार अक्षर वाला है, अस्तु श्रौषट् [ श्रौषट् होवे ] यह चार
अक्षर वाला है, यज [ यज्ञ कर ] यह दो अक्षर वाला है, ये यजामहे [जो हम यज्ञ करते हैं]
यह पांच अक्षर वाला है, वषट् [ यह शब्द ] दो अक्षर वाला ही है । ( सा एषा पङ्क्तिः
पंचपदा सप्तदशाक्षरा सर्वैः यज्ञैः यजमानं स्वर्गं लोकम् अभिवहति ) सो यही
पङ्क्ति पांच पाद वाली और सत्रह अक्षर वाली होकर सब यज्ञों के द्वारा यजमान को
स्वर्ग लोक में पहुँचाती है. (तत् यत्र अस्य ऐश्वर्यं स्यात्, वा यत्र एनम् अभिभवेयुः
एवंविदम् एव तत्र ब्रह्माणं वृणीयात् न अनेवंविदम् इति ब्राह्मणम् ) सो जहां
[ यज्ञ में ] इस [ यजमान ] का ऐश्वर्यं होवे, अथवा जहां इसको [ शत्रु लोग ] हरावें,
वहां ऐसे जानकार को ही ब्रह्मा चुने, ऐसे न जानने वाले को नहीं, यह ब्राह्मण है ॥ १०॥
भावार्थः—यथाविधि यज्ञ करने से मनुष्य कार्यसिद्धि करें ॥ १० ॥
( पुरस्तात् ) पूर्वस्यां दिशि ( पर्य्यन्तम् ) परिगतो अन्तो येन तम् । ( याज्या )
यजतेः ण्यत् । याजनीया । इष्टिः ( श्रौषट् ) श्रु श्रवणे—डोषटि + यज्ञादौ हविर्दा-
नम् ( वषट्कारः ) वह प्रापणे—डषटि+कृञ्+घञ् । देवोद्देश्यकहविस्त्यागः
( वृणीयात् ) स्वीकुर्यात् ( अनेवंविदम् ) अनेवंविधज्ञातारम् ॥