गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
Page 16 of 600
Read in context( १० )
आथर्वाणः ( आर्षो ह्रस्वः ) गो० पू० २ । २२ अथर्वाणः
कञ्चना ( आर्षो दीर्घः ) ,, ,, ३ । १५ कञ्चन
वेदा ( आर्षो दीर्घः ) ,, ,, ४ । ८ वेद
अतिरिच्येते ( आर्षप्रयोगः ) ;, ,, ४ । १८ अतिरिच्यते
प्रश्नायेयुः ( आर्षरूपम् ) ,, ,, ५ । २ प्रस्नायेयुः
ब्रह्म णस्याम् ( आर्षो ह्रस्वः ) ,, ,, ५ । २४ ब्राह्मणस्योम्
तानूनप्तृत्त्वम् ( आर्षो दीर्घः ) गो० उ० २ । २ तानूनप्त्रत्त्वम्
बभूवुः (आर्षं वहुवचनम्) गो० पू० ३ । ८ बभूव
पाठाशुद्धि समझते हुए भी पाठान्तरों के अभाव में जो पाठ हमने तद्वत् रहने दिये हैं
उनके कुछ उदाहरण निम्न हैं—
आर्ष-प्रयोगः कहे गये पाठ अपेक्षित शुद्ध पाठ
शृण्विति गो० पू० २ । २२ शृणोति
परिशिषेदेत् ,, ,, ३ । ५ परिषेधेत्
अद्यत्ति ,, ,, ३ । १० अत्ति
प्रातर्यावद्भ्यः ,, ,, ४ । ७ प्रातर्यावभ्यः
आश्यन्नः ,, ,, ३ । १६ आश्यानः
यद्यपि पाठान्तरों के अभाव में बहुत से भ्रष्टपाठ समझते हुये भी हमने तद्वत् रख
दिये हैं पुनरपि बहुत से ऐसे पाठ संशोधित भी किये हैं जो स्पष्ट रूप से व्याकरणानुसार
असाधु थे इनकी व्याकरण प्रक्रिया भी हमने ठीक की है। इनके कुछ नमूने यहाँ प्रदर्शित हैं—
पूर्व संस्करण प्रस्तुत संस्करण
मेहि गो० पू० २ । २० ( मा+एहि=मैहि ) मैहि
प्रायच्छत् ,, ,, २ । २१ ( अर्थसङ्गत्यनुसार ) प्रायच्छन्
तिष्ठन् ,, ,, २ । १६ ( व्याकरणानुसारी ) अतिष्ठन्
अत्तुर्वै पुरुषः ,, ,, २ । १५ ( जर्मन सं० में भी अभक्तर्तुर्वै पुरुषः पाठ है,
'अभवतुर्वै पुरुषः अर्थानुसार बदला है )
पर्युपसीदेरन् ,, ,, २ । १४ पर्युपासीरन्
यहाँ षद्लृ धातु के परस्मैपद होने से पर्युपसीदेरन् नहीं होगा, आस धातु से
पर्युपासीरन् पाठ उचित है।
कण्डिकाओं के मूल पाठों को ठीक न समझ सकने के कारण भी भाष्यगत शब्द
सिद्धियों में कतिपय भयंकर एवं हास्यास्पद भूलें हुई हैं, तद्यथा—
( १ ) गो० पू० १।२१ में 'वाकोवाक्यम्' शब्द के अर्थ को ठीक न समझ सकने
के कारण 'वाकः' 'वाक्यम्' ये पृथक्-पृथक् पद मानकर सिद्धि की गई है जिससे भाष्य भी
१. यहाँ भाष्य भी इस परिवर्तित पाठानुसार हमने कर दिया है ।।