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गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)

Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi

by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी

Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished600 pages

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गोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० २ । क० ५ ८५
[ वह बोला ] लौक्य [ देखने वा विचारने योग्य ] क्या है। ( ब्रह्मचर्य्यम् एव इति )
[ वे दोनों बोले ] ब्रह्मचर्य्य ही है। ( तत् कः वेद इति ) [ वह बोला ] उसका कौन
जानने वाला है। ( दन्तावलः धौम्रः ) [ वे दोनों बोले ] दन्तावल [ बड़े बड़े दांतों
वाला, ऋषि विशेष ] धौम्र [ धूएं का सा वर्ण वाला अथवा धूम्र ऋषि का शिष्य ] है ।
( अथ खलु दन्तावलः धौम्रः यावति तावति काले पारीक्षितं जनमेजयम् अभ्या-
जगाम ) फिर प्रसिद्ध है कि दन्तावल धौम्र किसी ही काल में परीक्षित् के पुत्र जनमेजय
के पास आ गया। ( तस्मै उत्थाय स्वयम् एव विष्टरं निदधौ ) उसको उठकर अपना
ही बिस्तर उसने दिया। ( तम् उपसंगृह्य पप्रच्छ अधीहि भोः किं पुण्यम् इति )
और उससे आदर के साथ मिलकर पूछा-महाराज ! बताओ पुण्य क्या है। ( ब्रह्मचर्य्यम्
इति ) [ दन्तावल बोला ] ब्रह्मचर्य्य है। ( किं लौक्यम् इति ) [ जनमेजय बोला ] लौक्य
[ देखने वा विचारने योग्य ] क्या है। ( ब्रह्मचर्य्यम् एव इति ) [ दन्तावल बोला ]
ब्रह्मचर्य्य ही है। ( तस्मै एतत् प्रोवाच ) और उससे यह भी वह बोला-( अष्टाचत्वारिं-
शद्वर्षं सर्ववेदब्रह्मचर्य्यम्, तत् वेदेषु व्यूह्य चतुर्धा द्वादशवर्षाणि अवरार्द्धं ब्रह्मचर्य्यम्,
अपरम् अपि यथाशक्ति स्तायन् चरेत् ) अड़तालीस वर्ष वाला सब वेदों के लिये ब्रह्म-
चर्य्य है, वह वेदों [ चार वेदों ] में बंट कर चार बार बारह बारह वर्ष वाला है,
बारह वर्ष अति न्यून भाग वाला ब्रह्मचर्य्य है, दूसरे [ शेष ब्रह्मचर्य्य ] को यथाशक्ति घेरता
हुआ करे। ( तस्मै उहसि ऋषभौ सहस्रं ददौ ) उसको [ जनमेजय ने ] विज्ञान विषय में
दो बैल और सहस्र [ मुद्रा ] दान किये। (अपि अपि कीर्तितम्-आचार्यः ब्रह्मचारी इति
एके आहुः, आकाशम्, अधिदैवतम्, अथ अध्यातम्, ब्राह्मणः व्रतवान् चरणवान्
ब्रह्मचारी ) यह भी अति प्रसिद्ध है-आचार्य ब्रह्मचारी होता है [ अथ० ११।५।१६ ]
इसके विषय में कोई कोई कहते हैं, आकाश [ आकाश समान व्यापक ] सबसे बड़े परमात्मा
का विषय है, किन्तु आत्मतत्त्व [ का विषय ] है-ब्राह्मण [ ब्रह्मज्ञानी ] ब्रह्मचर्य्य आदि
व्रत वाला और सुन्दर आचरण वाला ब्रह्मचारी. होता है ॥ ५ ॥
भावार्थ:-मनुष्य उपनयन संस्कार वा वेदारम्भ संस्कार से ब्रह्मचर्य्य के साथ
वेदों को क्रिया सहित अड़तालीस वर्ष में पढ़े और न्यून से न्यून बारह वर्ष में एक ही
वेद पढ़े और आगे यथाशक्ति पढ़ता रहे ॥ ५ ॥
विशेषः-प्रतीक वाला मन्त्र अर्थ सहित दिया जाता है-
णिजर्थे । अध्यापय (चतुर्धा) चतुःप्रकारेण (व्यूह्य) वि+ऊह वितर्के-ल्यप् । विभज्य
( द्वादशवर्षम् ) द्वादशद्वादशवर्षोपेतम् ( अवरार्द्धम् ) अ + वृञ् वरणे-अञ् + ऋधु
वृद्धौ-घञ् । अवरेण आवरणीयेन अतिन्यूनैन अर्द्धेन भागेन युक्तम् ( स्तायन् ) ष्ट्यै
वेष्टने-शतृः । वेष्टमानः ( चरेत् ) कुर्यात् ( अपरम् ) भिन्नम् । शेषभागम् (उहसि)
श्रूयतेः स्वाङ्गे शिरः किच्च ( उ० ४। १९४) ऊह वितर्के-असुन् कित्, आर्षो ह्रस्वः ।
विज्ञानविषये ( ऋषभौ ) वृषभौ ( कीर्तितम् ) कृत्त संशब्देने-क्तः । कथितम् ।
ख्यातम् (चरणवान् ) सदाचारी ॥