गोपथ ब्राह्मण (अथर्ववेद - क्षेमकरणदास त्रिवेदी हिन्दी भाष्य)
Gopatha Brahmana with Hindi Bhashya by Pt. Kshemkarandas Trivedi
by महर्षि गोपथ / पं. क्षेमकरणदास त्रिवेदी
Source: चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · 1950 (origin)
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Read in contextगोपथब्राह्मणे पूर्वभागे प्र० १ । क० ३७ ६५
स्पतिभिः पशून् प॑शुभिः कर्म कर्मणा तपस्तपसा सत्यं, सत्येन ब्रह्म, ब्रह्मणा
ब्राह्मणं, ब्राह्मणेन व्रतं, व्रतेन वै ब्राह्मणः संशितो भवत्यशून्यो भवत्यविच्छिन्नो
भवत्यविच्छिन्नोऽस्य तन्तुरविच्छिन्नं जीवनं भवति य एवं वेद यश्चैवं विद्वानेवमेतं
सावित्र्यास्तृतीयं पादं व्याचष्टे ॥ ३६ ॥
कण्डिका ३६ ।। सावित्री वा गायत्री मन्त्र के तीसरे पाद की व्याख्या ।।
(धियो यो नः प्रचोदयात्—इति सावित्र्याः तृतीयः पादः) जो हमारी बुद्धियों
वा कर्मों को आगे बढ़ावे—यह सावित्री का तीसरा पाद है। (दिवा साम, साम्ना
आदित्यम्, आदित्येन रश्मीन्, रश्मिभिः वर्षम्, वर्षेण ओषधिवनस्पतीन्, ओषधि-
वनस्पतिभिः पशून्, पशुभिः कर्म, कर्मणा तपः, तपसा सत्यम्, सत्येन ब्रह्म, ब्रह्मणा
ब्राह्मणम्, ब्राह्मणेन व्रतम् समदधात्) प्रकाश के साथ साम [मोक्षज्ञान] को साम के साथ
प्रकाशमान वा रस लेने वाले सूर्य को, सूर्य के साथ किरणों को, किरणों के साथ वर्षा को,
वर्षा के साथ ओषधियों [सोमलता यव आदि] और वनस्पतियों [पीपल आदि ] को, ओषधि
और वनस्पतियों के साथ पशुओं [जीवों] को, पशुओं के साथ कर्म को, कर्म के साथ तप
[ ब्रह्मचर्य आदि ] को, तप के साथ सत्य [यथार्थता] को, सत्य के साथ ब्रह्म [ वेदज्ञान ] को,
वेदज्ञान के साथ ब्राह्मण [ वेदज्ञानी ] को, ब्राह्मण के साथ व्रत [ जितेन्द्रियता आदि ] को
उस [ तीसरे पाद ] ने ठहराया । (व्रतेन वै ब्राह्मणः संशितः भवति, अशून्यः भवति,
अविच्छिन्नः भवति, अविच्छिन्नः अस्य तन्तुः, अविच्छिन्नं जीवनं भवति, यः
एवं वेद, यः च एवं विद्वान् एवम् एतम् सावित्र्याः तृतीयं पादं व्याचष्टे ) व्रत
[ जितेन्द्रियता आदि ] से ही वह ब्राह्मण [ वेदज्ञानी ] तीक्ष्ण बुद्धि वाला [ वा यत्नवान् ]
होता है, शून्य बिना [ परिपूर्ण ] होता है, अनकट होता है, अनकट उसका तांता—
[ वंश ], अनकट जीवन होता है, जो ऐसा जानता है और जो ऐसा जानकार पुरुष इस
प्रकार से सावित्री के तीसरे पाद को बताता है ॥ ३६ ॥
भावार्थः—मनुष्य सावित्री के तीसरे पाद के साथ सामवेद द्यौलोक आदित्य
आदि के विचार से अपने और सन्तान आदि के जीवन को सुदृढ़ करे ॥ ३६ ॥
कण्डिका ३७ ॥
तेन ह वा एवं विदुषा ब्राह्मणेन ब्रह्माभिपन्नं प्रसितं परामृष्टं १, ब्रह्मणाऽ-
काशमभिपन्नं ग्रसितं परामृष्टमा २, काशेन वायुरभिपन्नो ग्रसितः परामृष्टो ३,
३६--( धियः ) ध्यायतेः संप्रसारणं च ( वा० पा० ३ । २ । १७८ ) ध्यै
चिन्तने—क्विप् संप्रसारणं च । धीः कर्मनाम--निघ० २ । १ । प्रज्ञानाम-निघ०
३ । ९ । बुद्धीः । कर्माणि ( आदित्यम् ) आदीप्यमानम् । रसानामादातारम् ।
सूर्यम् ( रश्मीन् ) अश्नोतेरशच् ( उ० ४ । ४६) अशूङ् व्याप्तौ—मिः, धातोः रश्चा-
देशः । किरणान् । अन्यद्गतम् ।।
१. यह प्रकरण तैत्तिरीय उपनिषद् २, १ से तुलनीय है ।। सम्पा० ।।
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