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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि द्वारा

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DevanagariHindipublished675 पृष्ठ

इस ग्रन्थ के बारे में

भगवद्गीता के अतिरिक्त भी पुराणों और महाभारत में अनेक ऐसे संवाद हैं जिन्हें 'गीता' कहा जाता है। गीताप्रेस, गोरखपुर का 'गीता-संग्रह' (पुस्तक संख्या १९५८) ऐसे पच्चीस गीता-ग्रन्थों का अनुवाद-सहित संकलन है, जिसमें प्रत्येक गीता का मूल पाठ हिन्दी अर्थ के साथ दिया गया है।

विषय-सूची से संग्रह का विस्तार स्पष्ट होता है। गणेश पुराण से गणेशगीता; श्रीमद्भागवत से भिक्षुगीता, परमहंसगीता, हंसगीता और अवधूतगीता; महाभारत से षड्जगीता, पिङ्गलागीता, शम्पाकगीता, मङ्किगीता, आजगरगीता, हारीतगीता, वृत्रगीता, पुत्रगीता, कामगीता, नारदगीता, एक और हंसगीता तथा उत्तरगीता; विष्णुपुराण और अग्निपुराण से दो यमगीताएँ; अध्यात्म रामायण और अद्भुत रामायण से दो रामगीताएँ; देवीपुराण से भगवतीगीता (पार्वतीगीता); और साथ में अष्टावक्रगीता तथा दत्तात्रेय की अवधूतगीता।

इनमें से कई गीताएँ छोटे-छोटे प्रसंगों में वैराग्य, सन्तोष, आत्मज्ञान और भक्ति का उपदेश देती हैं, जैसे पिङ्गला वेश्या का वैराग्य या अजगर-वृत्ति वाले मुनि का सन्तोष। स्कैन की गई प्रति संवत् २०७४ का छठा पुनर्मुद्रण है। ६७५ पृष्ठों का यह संग्रह उन पाठकों के लिए है जो एक ही जिल्द में भारतीय अध्यात्म की इन बिखरी शिक्षाओं को पढ़ना चाहते हैं।

* जीवनमुक्तगीता * ६७१


हृदि ध्यानेन पश्यन्ति प्रकाशं क्रियते मनः।
सोऽहं हंसेति पश्यन्ति जीवन्मुक्तः स उच्यते॥१७॥
जो साधक अपने हृदयमें उस परमतत्त्वका 'सोऽहं—हंसः' रूपसे ध्यानकरते हैं तथा अपने चित्तको उससे प्रकाशित करते हैं, वे जीवन्मुक्त कहे जाते हैं॥१७॥

शिवशक्तिसमात्मानं पिण्डब्रह्माण्डमेव च।
चिदाकाशं हृदं मोहं जीवन्मुक्तः स उच्यते॥१८॥
अपनी आत्माको शिव-शक्तिरूप परमात्मतत्त्व जानकर और अपने शरीर तथा ब्रह्माण्डको समान जानता हुआ जो हृदयस्थित मोहको चिदाकाशमें विलीन कर देता है, वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥१८॥

जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिञ्च तुरीयावस्थितं सदा।
सोऽहं मनो विलीयेत जीवन्मुक्तः स उच्यते॥१९॥
जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तथा तुरीयावस्थामें रहते हुए भी जिसका मन सदा सोऽहं (मैं वही परमात्मतत्त्व हूँ)-के भावमें मग्न रहता है, वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥१९॥

सोऽहं स्थितं ज्ञानमिदं सूत्रेषु मणिवत्परम्।
सोऽहं ब्रह्म निराकारं जीवन्मुक्तः स उच्यते॥२०॥
मैं वही निराकार ब्रह्म हूँ—इस सोऽहं ज्ञानधारामें जो उसी प्रकार निरन्तर स्थित रहता है, जैसे पिरोयी गयी मणिमालामें सूत्र निरन्तर विद्यमान रहता है, वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है॥२०॥

मन एव मनुष्याणां भेदाभेदस्य कारणम्।
विकल्पनैव संकल्पो जीवन्मुक्तः स उच्यते॥२१॥
विकल्प और संकल्पात्मक मन ही मनुष्योंके भेद और ऐक्यका

६७२ * गीता-संग्रह *


हेतु है, जो ऐसा जानता है (और मनके पार चला जाता है), वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है ॥ २१ ॥
मन एव विदुः प्राज्ञाः सिद्धसिद्धान्त एव च ।
सदा दृढं तदा मोक्षो जीवन्मुक्तः स उच्यते ॥ २२ ॥
विद्वानोंने मनको ही जान लिया है। सिद्ध-सिद्धान्त भी यही है कि (साधनामें) मनकी दृढ़तासे ही मोक्ष प्राप्त होता है। जिसने इस सत्यको जान लिया, वही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है ॥ २२ ॥
योगाभ्यासी मनःश्रेष्ठो अन्तस्त्यागी बहिर्जडः ।
अन्तस्त्यागी बहिस्त्यागी जीवन्मुक्तः स उच्यते ॥ २३ ॥
मनसे अन्तर्वृत्तियोंका त्याग और बाह्यवृत्तियोंकी उपेक्षा करनेवाला योगाभ्यासी श्रेष्ठ है, किंतु अन्तः और बाह्य—दोनों वृत्तियोंका मनसे त्याग करनेवाला ही वस्तुतः जीवन्मुक्त कहा जाता है ॥ २३ ॥
॥ इति श्रीमद्दत्तात्रेयकृता जीवन्मुक्तगीता सम्पूर्णा ॥

Code 1958

गीता-संग्रह


गीताप्रेस गोरखपुर
GITA PRESS, GORAKHPUR

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