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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

Page 81 of 675

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८० * गीता-संग्रह *


विषयाणां तु यो भोगो भासतेऽमृतवत्पुरा।
हालाहलमिवान्ते यद्राजसं सुखमीरितम्॥ २३॥
विषयोंका जो भोग प्रथम तो अमृतके समान विदित हो और अन्तमें विषके समान फल दे, उसे राजसी सुख कहते हैं॥ २३॥

तन्द्राप्रमादसम्भूतमालस्यप्रभवं च यत्।
सर्वदा मोहकं स्वस्य सुखं तामसमीदृशम्॥ २४॥
न तदस्ति यदेतैर्यन्युक्तं स्यात्त्रिविधैर्गुणैः॥ २५॥
जो तन्द्रा तथा प्रमादसे उत्पन्न हुआ हो, आलस्यसे भरा हुआ हो तथा अपनेको सदा मोह उत्पन्न करता हो, उसका नाम तामसी सुख है। ऐसा कोई भी प्राणी नहीं है, जो इन तीनों गुणोंसे मुक्त हो॥ २४-२५॥

राजन् ब्रह्मापि त्रिविधमोन्तत्सदिति भेदतः।
त्रिलोकेषु त्रिधाभूतमखिलं भूप वर्तते॥ २६॥
हे राजन्! ब्रह्म भी ओम्, तत्, सत्—इस भेदसे तीन प्रकारका है और हे राजन्! इस त्रिलोकीमें सब कुछ तीन होकर ही व्याप्त हैं॥ २६॥

ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्राः स्वभावाद्भिन्नकर्मिणः।
तानि तेषां तु कर्माणि सङ्क्षेपात्तेऽधुना वदे॥ २७॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—ये स्वभावसे ही भिन्न कर्म करनेवाले हैं, इनके कर्म संक्षेपसे मैं तुमसे कहता हूँ॥ २७॥

अन्तर्बाह्येन्द्रियाणां च वश्यत्वमार्जवं क्षमा।
नानातपांसि शौचं च द्विविधं ज्ञानमात्मनः॥ २८॥
वेदशास्त्रपुराणानां स्मृतीनां ज्ञानमेव च।
अनुष्ठानं तदर्थानां कर्म ब्राह्ममुदाहृतम्॥ २९॥
बाह्य और अन्तः इन्द्रियोंको वशमें करना, सरलता, क्षमा, अनेक