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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

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Page 73

७२ * गीता-संग्रह *


दसवाँ अध्याय

दैवी और आसुरी प्रकृति

श्रीगजानन उवाच

दैव्यासुरि राक्षसी च प्रकृतिस्त्रिविधा नृणाम्।
तासां फलानि चिह्नानि सङ्क्षेपात्तेऽधुना ब्रुवे॥ १॥
श्रीगणेशजी बोले—दैवी, आसुरी, राक्षसी—तीन प्रकारकी मनुष्योंकी प्रकृति होती है, उनके फल और चिह्न संक्षेपसे अब तुम्हारे लिये वर्णन करता हूँ॥ १॥

आद्या संसाधयेन्मुक्तिं द्वे परे बन्धनं नृप।
चिह्नं ब्रवीमि चाद्यायास्तन्मे निगदतः शृणु॥ २॥
दैवी प्रकृति मुक्तिकी साधना करती है, आगेकी दोनों बन्धनमें डालती हैं। इनमें पहले दैवी प्रकृतिके चिह्न कहता हूँ, उन्हें तुम सुनो॥ २॥

अपैशुन्यं दयाक्रोधोऽचापल्यं धृतिरार्जवम्।
तेजोऽभयमहिंसा च क्षमा शौचममानिता।
इत्यादि चिह्नमाद्याया आसुर्याः शृणु साम्प्रतम्॥ ३॥
चुगली न करना, दया, अक्रोध, अचपलता, धैर्य, सरलता, तेज, अभय, अहिंसा, क्षमा, शौच, निरभिमानिता इत्यादि चिह्न दैवी प्रकृतिके समझने चाहिये। अब आसुरीके चिह्न सुनो॥ ३॥

अतिवादोऽभिमानश्च दर्पोऽज्ञानं सकोपता।
आसुर्या एवमाद्यानि चिह्नानि प्रकृतेर्नृप॥ ४॥
हे राजन्! अतिवाद, अभिमान, दर्प, अज्ञान और क्रोध—ये आसुरी प्रकृतिके चिह्न हैं॥ ४॥

निष्ठुरत्वं मदो मोहोऽहङ्कारो गर्व एव च॥ ५॥
द्वेषो हिंसादया क्रोध औद्धत्यं दुर्विनीतता।
अभिचारिककर्तृत्वं क्रूरकर्मरतिस्तथा॥ ६॥
(राक्षसी प्रकृतिके ये चिह्न हैं—) निष्ठुरता, मद, मोह, अहंकार,