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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

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७० * गीता-संग्रह *


गुणैस्त्रिभिरियं देहे बध्नाति पुरुषं दृढम्।
यदा प्रकाशः क्षान्तिश्च वृद्धे सत्त्वे तदाधिकम्॥ ३१॥
प्रकृतिके तीन गुण ही इस पुरुषको देहमें बाँधते हैं, जिस समय देहमें शान्ति और प्रकाशकी वृद्धि हो, तब सत्त्वगुणकी वृद्धि होती है॥ ३१॥

लोभोऽशमः स्पृहारम्भः कर्मणां रजसो गुणः।
मोहोऽप्रवृत्तिश्चाज्ञानं प्रमादस्तमसो गुणः॥ ३२॥
लोभ, अशान्ति, स्पृहा और कर्मारम्भ—ये रजोगुणके धर्म हैं। मोह, आलस्य, अज्ञान और प्रमाद—इन्हें ही तमोगुण जानना चाहिये॥ ३२॥

सत्त्वाधिकः सुखं ज्ञानं कर्मसङ्गं रजोऽधिकः।
तमोऽधिकश्च लभते निद्रालस्यं सुखेतरत्॥ ३३॥
सत्त्वगुण अधिक होनेसे सुख और ज्ञानकी, रजोगुण अधिक होनेसे कर्मकी और तमोगुण अधिक होनेसे सुखसे इतर निद्रा और आलस्यकी प्राप्ति होती है॥ ३३॥

एषु त्रिषु प्रवृद्धेषु मुक्तिसंसृतिदुर्गतीः।
प्रयान्ति मानवा राजंस्तस्मात्सत्त्वयुतो भव॥ ३४॥
इन तीनोंकी वृद्धिमें क्रमसे मुक्ति, संसार और दुर्गंतिकी प्राप्ति मनुष्योंको होती है, इस कारण हे राजन्! सत्त्वगुणयुक्त होओ॥ ३४॥

ततश्च सर्वभावेन भज त्वं मां नरेश्वर।
भक्त्या चाव्यभिचारिण्या सर्वत्रैव च संस्थितम्॥ ३५॥
हे नरेश्वर! तदनन्तर सर्वभावसे तुम मेरा भजन करो और निश्चल भक्तिसे सर्वत्र स्थित मुझे स्थित जानो॥ ३५॥

अग्नौ सूर्ये तथा सोमे यच्च तारासु संस्थितम्।
विदुषि ब्राह्मणे तेजो विद्धि तन्मामकं नृप॥ ३६॥
हे राजन्! अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, तारागण और विद्वान् ब्राह्मणमें