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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

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६८ * गीता-संग्रह *


है तथा क्षेत्र और क्षेत्रज्ञको जानता है, वही मेरा सबसे प्रिय है॥१९॥

वरेण्य उवाच

किं क्षेत्रं कश्च तद्वेत्ति किं तज्ज्ञानं गजानन।
एतदाचक्ष्व मह्यं त्वं पृच्छते करुणाम्बुधे॥२०॥

वरेण्य बोले— हे गजानन! क्षेत्र क्या है और उसको जाननेवाला कौन है, उसका ज्ञान क्या है, हे करुणासागर! मुझ प्रश्न करनेवालेको यह सब आप बताइये॥२०॥

श्रीगजानन उवाच

पञ्चभूतानि तन्मात्राः पञ्चकर्मेन्द्रियाणि च।
अहङ्कारो मनो बुद्धिः पञ्चज्ञानेन्द्रियाणि च॥२१॥
इच्छाव्यक्तं धृतिद्वेषौ सुखदुःखे तथैव च।
चेतनासहितश्चायं समूहः क्षेत्रमुच्यते॥२२॥

श्रीगणेशजी बोले— [पृथ्वी, जल आदि] पाँच महाभूत और उनकी [गन्ध, रस आदि] तन्मात्राएँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, अहंकार, मन, बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, अव्यक्त (मूल प्रकृति), इच्छा, धैर्य, द्वेष, सुख-दुःख और चेतनासहित यह सारा समूह क्षेत्र कहलाता है॥२१-२२॥

तज्ज्ञं त्वं विद्धि मां भूप सर्वान्तर्यामिणं विभुम्।
अयं समूहोऽहं चापि यज्ज्ञानविषयौ नृप॥२३॥

हे राजन्! उसको जाननेवाला सर्वान्तर्यामी सर्वव्यापक तुम मुझको जानो। मैं और यह समूह—ये दोनों ज्ञानके विषय हैं॥२३॥

आर्जवं गुरुशुश्रूषा विरक्तिश्चेन्द्रियार्थतः।
शौचं क्षान्तिरदम्भश्च जन्मादिदोषवीक्षणम्॥२४॥
समदृष्टिर्दृढा भक्तिरेकान्तित्वं शमो दमः।
एतैर्येच्च युतं ज्ञानं तज्ज्ञानं विद्धि बाहुज॥२५॥

सरलता, गुरुशुश्रूषा, इन्द्रियोंका विषयोंसे वैराग्य, पवित्रता,