गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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भजन् भक्त्या विहीनो यः स चाण्डालोऽभिधीयते।
चाण्डालोऽपि भजन् भक्त्या ब्राह्मणेभ्योऽधिको मम॥८॥
जो भक्तिविहीन होकर भजन करता है, वह चाण्डाल है और जो जन्मसे चाण्डाल होकर भी मेरा भक्तिपूर्वक भजन करता है, वह उस ब्राह्मणसे श्रेष्ठ है॥८॥
शुकाद्याः सनकाद्याश्च पुरा मुक्ता हि भक्तितः।
भक्त्यैव मामनुप्राप्ता नारदाद्याश्चिरायुषः॥९॥
शुकादि तथा सनकादि ऋषिगण भक्तिसे ही मुक्त हुए हैं और भक्तिसे ही नारद और चिरजीवी मार्कण्डेयादि मुझको प्राप्त हुए हैं॥९॥
अतो भक्त्या मयि मनो निधेहि बुद्धिमैव च।
भक्त्या यजस्व मां राजंस्ततो मामेव यास्यसि॥१०॥
इस कारण भक्तिसे मन और बुद्धि मुझमें लगानी चाहिये, हे राजन्! भक्तिपूर्वक मेरा यजन करोगे तो मुझको ही प्राप्त होओगे॥१०॥
असमर्थोऽर्पितुं स्वान्तमेवं मयि नराधिप।
अभ्यासेन च योगेन ततो गन्तुं यतस्व माम्॥११॥
हे राजन्! यदि मुझमें अपना मन न लगा सको तो अभ्यासयोगसे मुझे प्राप्त होनेका यत्न करो॥११॥
तत्रापि त्वमशक्तश्चेत्कुरु कर्म मदर्पणम्।
ममानुग्रहतश्चैवं परां निर्वृतिमेष्यसि॥१२॥
और जो यह भी न हो सके तो जो कुछ कर्म करो, उसे मुझे अर्पित करो, मेरी कृपासे तुम परम शान्तिको प्राप्त होओगे॥१२॥
अथैतदप्यनुष्ठातुं न शक्तोऽसि तदा कुरु।
प्रयत्नतः फलत्यागं त्रिविधानां हि कर्मणाम्॥१३॥
और यदि यह भी न कर सको तो यत्नपूर्वक तीनों प्रकारके