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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

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६४ * गीता-संग्रह *


चतुर्वेदार्थतत्त्वज्ञाश्चतुःशास्त्रविशारदाः ।
यज्ञदानतपोनिष्ठा न मे रूपं विदन्ति ते॥ २४॥
चारों वेदोंके अर्थके तत्त्वको जाननेवाले, सम्पूर्ण शास्त्रोंमें कुशल, यज्ञ, दान और तप करनेवाले भी मेरे रूपको [यथार्थतः] नहीं जानते॥ २४॥
शक्योऽहं वीक्षितुं ज्ञातुं प्रवेष्टुं भक्तिभावतः।
त्यज भीतिं च मोहं च पश्य मां सौम्यरूपिणम्॥ २५॥
मैं भक्तिभावसे जानने, दीखने, प्राप्त होनेके योग्य हूँ, अब तुम भय और मोहको त्यागकर मेरे सौम्य रूपको देखो॥ २५॥
मद्भक्तो मत्परः सर्वसङ्गहीनो मदर्थकृत्।
निष्क्रोधः सर्वभूतेषु समो मामेति भूभुज॥ २६॥
हे राजन्! जो भक्त मेरे परायण एवं सर्व संगत्यागी होकर सब कर्म मुझमें ही समर्पित करते हैं और क्रोध त्यागकर सर्व प्राणियोंमें समान दृष्टि रखते हैं, वे मुझको ही प्राप्त होते हैं॥ २६॥
॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां विश्वरूपदर्शनो नामाष्टमोऽध्यायः॥८॥


नवाँ अध्याय

सगुणोपासनाकी श्रेष्ठता; क्षेत्र, ज्ञान तथा ज्ञेयका वर्णन

वरेण्य उवाच
अनन्यभावास्त्वां सम्यङ्मूर्तिमन्तमुपासते।
योऽक्षरं परमव्यक्तं तयोः कस्ते मतोऽधिकः॥ १॥
वरेण्य बोले—[हे भगवन्!] मूर्तिमान् आपकी जो अनन्यभावसे उपासना करते हैं और जो अक्षर एवं परम अव्यक्त आपकी उपासना करते हैं, उनमें श्रेष्ठ कौन है?॥ १॥