गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- अवधूतगीता ( २ ) *
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हैं। आपका भाग्य और सौन्दर्य भी प्रशंसनीय है। आपकी वाणीसे
तो मानो अमृत टपक रहा है। फिर भी आप जड, उन्मत्त अथवा
पिशाचके समान रहते हैं; न तो कुछ करते हैं और न चाहते ही हैं॥ २८ ॥
जनेषु दह्यमानेषु कामलोभदवाग्निना।
न तप्यसेऽग्निना मुक्तो गङ्गाम्भःस्थ इव द्विपः ॥ २९ ॥
संसारके अधिकांश लोग काम और लोभके दावानलसे जल रहे हैं।
परन्तु आपको देखकर ऐसा मालूम होता है कि आप मुक्त हैं, आपतक
उसकी आँच भी नहीं पहुँच पाती; ठीक वैसे ही जैसे कोई हाथी वनमें
दावाग्नि लगनेपर उससे छूटकर गंगाजलमें खड़ा हो॥ २९॥
त्वं हि नः पृच्छतां ब्रह्मन्नात्मन्यानन्दकारणम्।
ब्रूहि स्पर्शविहीनस्य भवतः केवलात्मनः ॥ ३० ॥
ब्रह्मन्! आप पुत्र, स्त्री, धन आदि संसारके स्पर्शसे भी रहित
हैं। आप सदा-सर्वदा अपने केवल स्वरूपमें ही स्थित रहते हैं। हम
आपसे यह पूछना चाहते हैं कि आपको अपने आत्मामें ही ऐसे
अनिर्वचनीय आनन्दका अनुभव कैसे होता है? आप कृपा करके अवश्य
बतलाइये॥ ३०॥
श्रीभगवानुवाच
यदुनैवं महाभागो ब्रह्मण्येन सुमेधसा।
पृष्टः सभाजितः प्राह प्रश्रयावनतं द्विजः ॥ ३१ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—उद्धव! हमारे पूर्वज महाराज यदुकी
बुद्धि शुद्ध थी और उनके हृदयमें ब्राह्मणभक्ति थी। उन्होंने परमभाग्यवान्
दत्तात्रेयजीका अत्यन्त सत्कार करके यह प्रश्न पूछा और बड़े
विनम्रभावसे सिर झुकाकर वे उनके सामने खड़े हो गये। अब
दत्तात्रेयजीने कहा॥ ३१॥