गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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सुरविद्याधरैर्यक्षैः किन्नरैर्मुनिमानुषैः।
नृत्यद्भिरप्सरोभिश्च गन्धर्वैर्गानतत्परैः॥१३॥
देवता, विद्याधर, यक्ष, किन्नर, मुनि, मनुष्य, नृत्य करती हुई अप्सराओं और गान करते हुए गन्धर्वोंसे आपका स्वरूप सेवित है॥१३॥
वसुरुद्रादित्यगणैः सिद्धैः साध्यैर्मुदायुतैः।
सेव्यमानमहाभक्त्यावीक्ष्यमाणं सुविस्मितैः॥१४॥
आठ वसु, बारह आदित्योंके गण, सिद्ध, साध्य—ये सब प्रसन्नतापूर्वक आपकी सेवा करते और महाभक्तिसे विस्मयको प्राप्त होकर आपको देखते हैं॥१४॥
वेत्तारमक्षरं वेद्यं धर्मगोप्तारमीश्वरम्।
पातालानि दिशः स्वर्गान् भुवं व्याप्याखिलं स्थितम्॥१५॥
ये आपको ज्ञाता, अक्षर, वेद्य, धर्मके रक्षक, पाताल, दिशा, स्वर्ग और पृथ्वीमें व्यापक और ईश्वर जानते हैं॥१५॥
भीता लोकास्तथा चाहमेवं त्वां वीक्ष्य रूपिणम्।
नानादंष्ट्राकरालं च नानाविद्याविशारदम्॥१६॥
आपके रूपको देखकर सम्पूर्ण लोक तथा मैं भी डर गया हूँ, यह आपका मुख अनेक तीक्ष्ण दाढ़ोंसे भयंकर है तथा आप अनेक विद्याओंके पारगामी हैं॥१६॥
प्रलयानलदीप्तास्यं जटिलं च नभःस्पृशम्।
दृष्ट्वा गणेश ते रूपमहं भ्रान्त इवाभवम्॥१७॥
प्रलयकी अग्निके समान दीप्तिमान् आपका मुख है, जिसकी जटाएँ आकाशको छूती हैं, हे गणेशजी! आपका यह रूप देखकर मैं भ्रान्त हो गया हूँ॥१७॥
देवा मनुष्या नागाद्याः खगास्त्वदुदरेशयाः।
नानायोनिभुजश्चान्ते त्वय्येव विशन्ति च।
अब्धेरुत्पद्यमानास्ते यथा जीमूतबिन्दवः॥१८॥
देवता, मनुष्य, नागादि और खग तुम्हारे उदरमें शयन करते हैं,