गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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आत्मतत्त्वका उपदेश करनेवाला आपके अतिरिक्त देवताओंमें भी कोई
नहीं है। ब्रह्मा आदि जितने बड़े-बड़े देवता हैं, वे सब शरीराभिमानी
होनेके कारण आपकी मायासे मोहित हो रहे हैं। उनकी बुद्धि मायाके
वशमें हो गयी है। यही कारण है कि वे इन्द्रियोंसे अनुभव किये
जानेवाले बाह्य विषयोंको सत्य मानते हैं। इसीलिये मुझे तो आप ही
उपदेश कीजिये ॥ १७ ॥
तस्माद् भवन्तमनवद्यमनन्तपारं
सर्वज्ञमीश्वरमकुण्ठविकुण्ठधिष्ण्यम् ।
निर्विण्णधीरहमह वृजिनाभितप्तो
नारायणं नरसखं शरणं प्रपद्ये ॥ १८ ॥
भगवन्! इसीसे चारों ओरसे दुःखोंकी दावाग्निसे जलकर और
विरक्त होकर मैं आपकी शरणमें आया हूँ। आप निर्दोष, देश-कालसे
अपरिच्छिन्न, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् और अविनाशी वैकुण्ठ-लोकके
निवासी एवं नरके नित्य सखा नारायण हैं। (अतः आप ही मुझे उपदेश
कीजिये) ॥ १८ ॥
श्रीभगवानुवाच
प्रायेण मनुजा लोके लोकतत्त्वविचक्षणाः ।
समुद्धरन्ति ह्यात्मानमात्मनैवाशुभाशयात् ॥ १९ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—उद्धव! संसारमें जो मनुष्य 'यह
जगत् क्या है? इसमें क्या हो रहा है?' इत्यादि बातोंका विचार करनेमें
निपुण हैं, वे चित्तमें भरी हुई अशुभ वासनाओंसे अपने-आपको स्वयं
अपनी विवेकशक्तिसे ही प्रायः बचा लेते हैं ॥ १९ ॥
आत्मनो गुरुरात्मैव पुरुषस्य विशेषतः ।
यत् प्रत्यक्षानुमानाभ्यां श्रेयोऽसावनुविन्दते ॥ २० ॥
समस्त प्राणियोंका विशेषकर मनुष्यका आत्मा अपने हित और