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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 623

६२२ * गीता-संग्रह *


चुका। इसी कामके लिये ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे मैं बलरामजीके साथ
अवतीर्ण हुआ था॥ २॥
कुलं वै शापनिर्दग्धं नङ्क्ष्यत्यन्योन्यविग्रहात्।
समुद्रः सप्तमेऽह्न्येतां पुरीं च प्लावयिष्यति॥ ३॥
अब यह यदुवंश, जो ब्राह्मणोंके शापसे भस्म हो चुका है,
पारस्परिक फूट और युद्धसे नष्ट हो जायगा। आजके सातवें दिन
समुद्र इस पुरी—द्वारकाको डुबो देगा॥ ३॥
यर्ह्येवायं मया त्यक्तो लोकोऽयं नष्टमङ्गलः।
भविष्यत्यचिरात् साधो कलिनापि निराकृतः॥ ४॥
प्यारे उद्धव! जिस क्षण मैं मर्त्यलोकका परित्याग कर दूँगा, उसी
क्षण इसके सारे मंगल नष्ट हो जायँगे और थोड़े ही दिनोंमें पृथ्वीपर
कलियुगका बोलबाला हो जायगा॥ ४॥
न वस्तव्यं त्वयैवेह मया त्यक्ते महीतले।
जनोऽधर्मरुचिर्भद्र भविष्यति कलौ युगे॥ ५॥
जब मैं इस पृथ्वीका त्याग कर दूँ, तब तुम इसपर मत रहना;
क्योंकि साधु उद्धव! कलियुगमें अधिकांश लोगोंकी रुचि अधर्ममें
ही होगी॥ ५॥
त्वं तु सर्वं परित्यज्य स्नेहं स्वजनबन्धुषु।
मय्यावेश्य मनः सम्यक् समदृग् विचरस्व गाम्॥ ६॥
अब तुम अपने आत्मीय स्वजन और बन्धु-बान्धवोंका स्नेह-
सम्बन्ध छोड़ दो और अनन्यप्रेमसे मुझमें अपना मन लगाकर समदृष्टिसे
पृथ्वीमें स्वच्छन्द विचरण करो॥ ६॥
यदिदं मनसा वाचा चक्षुर्भ्यां श्रवणादिभिः।
नश्वरं गृह्यमाणं च विद्धि मायामनोमयम्॥ ७॥
इस जगत्में जो कुछ मनसे सोचा जाता है, वाणीसे कहा जाता
है, नेत्रोंसे देखा जाता है और श्रवण आदि इन्द्रियोंसे अनुभव किया