गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
Page 614 of 675
Read in context* अवधूतगीता ( १ ) *
६१३
स्तुत्या मया वाक्परता हता ते
क्षमस्व नित्यं त्रिविधापराधान् ॥ १ ॥
अवधूत श्रीदत्तात्रेयजी बोले—[हे प्रभो!] तुम्हारी धाम-यात्रा करनेसे मैंने तुम्हारी सर्वव्यापकता घटा दी, तुम्हारा ध्यान करनेसे मैंने तुम्हारा चित्तके परे होनेका गुण नष्ट कर दिया, मेरे द्वारा तुम्हारी स्तुति करनेसे तुम्हारा वाणीसे परे होनेका गुण छिप गया। तुम सदा मेरे इन तीनों अपराधोंको क्षमा करो ॥ १ ॥
कामैरहतधीर्दान्तो मृदुः शुचिरकिञ्चनः ।
अनीहो मितभुक्छान्तः स्थिरो मच्छरणो मुनिः ॥ २ ॥
कामनाओंसे अनाहत बुद्धिवाला, इन्द्रियोंका दमन करनेवाला, कोमल स्वभाववाला, पवित्र, संग्रहसे रहित, इच्छारहित, सीमित आहार ग्रहण करनेवाला, शान्त, स्थिर मतिवाला, आत्माकी शरण ग्रहण करनेवाला मुनि (आत्मज्ञानी) होता है ॥ २ ॥
अप्रमत्तो गभीरात्मा धृतिमाञ्जितषड्गुणः ।
अमानी मानदः कल्पो मैत्रः कारुणिकः कविः ॥ ३ ॥
वह प्रमादशून्य, गम्भीर स्वभाववाला, धैर्यसम्पन्न, [काम, क्रोध आदि] छः विकारोंको जीत लेनेवाला, मानरहित, दूसरोंको सम्मान देनेवाला, कर्तव्यपरायण, मैत्रीपूर्ण व्यवहारवाला, दयालु तथा कवि (दूरदर्शी) होता है ॥ ३ ॥
कृपालुरकृतद्रोहस्तितिक्षुः सर्वदेहिनाम् ।
सत्यासारोऽनवद्यात्मा समः सर्वोपकारकः ॥ ४ ॥
वह कृपालु, सभी देहधारियोंसे द्रोह न करनेवाला, सहनशील, सत्यसम्पन्न, निर्दोष मनवाला, सबके प्रति समान भाव रखनेवाला तथा सभीका उपकार करनेवाला होता है ॥ ४ ॥