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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

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DevanagariHindipublished675 pages

Page 608 of 675

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Page 608

* अवधूतगीता (१) * ६०७


अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम्॥ २४॥

यह (स्थूल-सूक्ष्मादि) देहका कल्पित भेद मिथ्या है। यह (चतुर्दश) लोकोंका कल्पित भेद भी मिथ्या है। मैं ही कल्याणस्वरूप तथा परमार्थ-तत्त्व हूँ तो फिर (अद्वैतरूप) मैं यहाँ वन्दन किस प्रकार करूँ? ॥ २४ ॥

सरजो विरजो न कदाचिदपि
ननु निर्मलनिश्चलशुद्ध इति।
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम्॥ २५॥

आत्मा रागयुक्त और रागरहित भी कभी नहीं है; वह निश्चय ही निर्मल, निश्चल तथा शुद्ध है। मैं ही कल्याणरूप तथा परमार्थ तत्त्व हूँ तो फिर [अद्वैतरूप] मैं यहाँ वन्दन किस प्रकार करूँ? ॥ २५ ॥

न हि देहविदेहविकल्प इति
अनृतं चरितं न हि सत्यमिति।
अहमेव शिवः परमार्थ इति
अभिवादनमत्र करोमि कथम्॥ २६॥

उस चेतन आत्मामें देहयुक्त और देहरहित होनेका विकल्प नहीं है; उसमें मिथ्या और सत्य चरित्रका भी विकल्प नहीं है। [आत्मस्वरूप] मैं ही कल्याणरूप तथा परमार्थ तत्त्व हूँ तो फिर [अद्वैतरूप] मैं यहाँ वन्दन किस प्रकार करूँ? ॥ २६ ॥

विन्दति विन्दति नहि नहि यत्र
छन्दो लक्षणं नहि नहि तत्र।
समरसमग्नो भावितपूतः
प्रलपति तत्त्वं परमवधूतः॥ २७॥

पवित्रतासे युक्त तथा एकरस आत्मानन्दमें मग्न परम अवधूत उस आत्मामें कुछ भी नहीं देखता है और वहाँ कुछ भी नहीं प्राप्त करता