गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- अवधूतगीता ( १ ) * ६०५
ननु धर्मविधर्मविनाश इति
ननु बन्धविबन्धविनाश इति।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिव-
मिह दुःखविदुःखमतिश्च कथम्॥ १८॥
यदि चेतन आत्मामें धर्म तथा विधर्मका अभाव है; यदि उसमें बन्धन तथा मोक्षका अभाव है और यदि वह एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो इसके प्रति दुःख-सुखकी बुद्धि किस प्रकार हो सकती है?॥ १८॥
न हि याज्ञिकयज्ञविभाग इति
न हुताशनवस्तुविभाग इति।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
वद कर्मफलानि भवन्ति कथम्॥ १९॥
याज्ञिक तथा यज्ञमें (वास्तविक) भेद नहीं है; इसी प्रकार अग्नि तथा हवनीय वस्तुमें भी भेद नहीं है। यदि आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो फिर बताओ कि कर्मोंके फल किस प्रकार हो सकते हैं?॥ १९॥
ननु शोकविशोकविमुक्त इति
ननु दर्पविदर्पविमुक्त इति।
यदि चैकनिरन्तरसर्वशिवं
ननु रागविरागमतिश्च कथम्॥ २०॥
वह आत्मा निश्चय ही शोक तथा अशोकसे रहित है; वह निश्चय ही अहंकार तथा निरहंकारसे रहित है। यदि वह आत्मा एक, नित्य, सर्वरूप तथा कल्याणस्वरूप है तो राग-विरागकी बुद्धि कैसे हो सकती है?॥ २०॥