गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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न हि बन्धविबन्धसमागमनं
न हि योगवियोगसमागमनम्।
न हि तर्कवितर्कसमागमनं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ २३॥
सामान्य बन्धन तथा विशेष बन्धन दोनोंका आगमन आत्मामें नहीं होता है, उसमें योगका तथा वियोगका आगमन नहीं होता और तर्कका तथा वितर्कका भी समावेश नहीं होता है; हे मन ! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ २३ ॥
इह कालविकालनिराकरण-
मणुमात्रकृशानुनिराकरणम् ।
न हि केवलसत्यनिराकरणं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ २४॥
इस आत्मामें सामान्य कालका तथा विशेष कालका निराकरण है; इसमें अणुमात्र भी अग्निका (भौतिक तत्त्वोंका) निराकरण है, इसमें एकमात्र सत्यका निराकरण नहीं है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो; तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ २४ ॥
इह देहविदेहविहीन इति
ननु स्वप्नसुषुप्तिविहीनपरम्।
अभिधानविधानविहीनपरं
किमु रोदिषि मानस सर्वसमम्॥ २५॥
यह आत्मा देह तथा विदेहसे रहित है; यह निश्चय ही स्वप्न तथा सुषुप्तिसे भी रहित और परे है, यह कथन तथा विधानसे भी रहित और परे है। हे मन! तुम किसलिये रुदन करते हो, तुम तो सर्वत्र समरूप हो ॥ २५ ॥