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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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Page 557

५५६ * गीता-संग्रह *


नहीं होता है, ऐसा नहीं सोचना चाहिये; [उनके भी अन्दर निहित
गुणोंका ग्रहण अवश्य कर लेना चाहिये।] अपवित्र स्थानमें भी पड़े
हुए रत्नको कोई भी मनुष्य कैसे त्याग सकता है?॥ १॥

नैवात्र काव्यगुण एव तु चिन्तनीयो
ग्राह्यः परं गुणवता खलु सार एव।
सिन्दूरचित्ररहिता भुवि रूपशून्या
पारं न किं नयति नौरिह गन्तुकामान्॥ २॥

किसी भी गुरुमें काव्यगुण (वाक्पटुता) पर विचार नहीं करना
चाहिये; गुणवान्‌से केवल सारवस्तुको ग्रहण कर लेना चाहिये। क्या
पृथ्वीलोकमें सिन्दूरके चित्रोंसे रहित और सौन्दर्यसे शून्य नौका पार
जानेकी इच्छावाले लोगोंको पार नहीं करती है?॥ २॥

प्रयत्नेन विना येन निश्चलेन चलाचलम्।
ग्रस्तं स्वभावतः शान्तं चैतन्यं गगनोपमम्॥ ३॥

बिना प्रयत्न के ही जिस ब्रह्मके द्वारा चल-अचलरूप सम्पूर्ण
जगत् व्याप्त है, वह स्वभावसे ही शान्त, चैतन्य तथा आकाशतुल्य
व्यापक है॥ ३॥

अयत्नाच्चालयेद्यस्तु एकमेव चराचरम्।
सर्वगं तत्कथं भिन्नमद्वैतं वर्तते मम॥ ४॥

जो व्यापक चेतन बिना प्रयासके अकेला ही चराचर जगत्‌को
संचालित करता है, वह अद्वैत ब्रह्म मुझसे भिन्न कैसे हो सकता है?॥ ४॥

अहमेव परं यस्मात्सारासारतरं शिवम्।
गमागमविनिर्मुक्तं निर्विकल्पं निराकुलम्॥ ५॥

चूँकि मैं ही परमतत्त्व हूँ, अतः सार तथा असारसे भी परे,
कल्याणस्वरूप, जन्म-मरणसे मुक्त, विकल्परहित तथा शान्त हूँ॥ ५॥

सर्वावयवनिर्मुक्तं तदहं त्रिदशार्चितम्।
सम्पूर्णत्वान्न गृह्णामि विभागं त्रिदशादिकम्॥ ६॥

वह [सच्चिदानन्दस्वरूप] मैं सभी अवयवोंसे रहित हूँ तथा