गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- अवधूतगीता ( १ ) * ५४७
परेण सहजात्मापि ह्यभिन्नः प्रतिभाति मे।
व्योमाकारं तथैवकं ध्याता ध्यानं कथं भवेत्॥ ३९॥
परब्रह्मके साथ अनादि आत्मा मुझे भेदरहित प्रतीत होता है। वह गगनाकार, व्यापक और एकरूप है। इसमें ध्याता और ध्यानका व्यवहार कैसे हो सकता है?॥ ३९॥
यत्करोमि यदश्नामि यज्जुहोमि ददामि यत्।
एतत्सर्वं न मे किञ्चिद्विशुद्धोऽहमजोऽव्ययः॥ ४०॥
मैं जो कुछ करता हूँ, जो कुछ खाता हूँ, जो कुछ हवन करता हूँ और जो कुछ देता हूँ—यह सब कुछ भी नहीं है; क्योंकि मैं शुद्ध, जन्मरहित तथा अव्यय हूँ॥ ४०॥
सर्वं जगद्विद्धि निराकृतीदं
सर्वं जगद्विद्धि विकारहीनम्।
सर्वं जगद्विद्धि विशुद्धदेहं
सर्वं जगद्विद्धि शिवैकरूपम्॥ ४१॥
तुम सम्पूर्ण जगत्को आकाररहित जानो, समस्त जगत्को विकाररहित जानो, समग्र जगत्को ब्रह्मका विग्रह जानो और सम्पूर्ण जगत्को एकमात्र कल्याणस्वरूप जानो॥ ४१॥
तत्त्वं त्वं हि न सन्देहः किं जानाम्यथवा पुनः।
असंवेद्यं स्वसंवेद्यमात्मानं मन्यसे कथम्॥ ४२॥
तुम वही परमतत्त्व हो, इसमें सन्देह नहीं है। तब तुम यह क्यों सोचते हो कि मैं आत्माको जानता हूँ अथवा नहीं जानता हूँ? जो आत्मा किसीसे भी न जाननेयोग्य है, उसे अपनेसे जाननेयोग्य कैसे मानते हो?॥ ४२॥
मायामाया कथं तात छायाछाया न विद्यते।
तत्त्वमेकमिदं सर्वं व्योमाकारं निरञ्जनम्॥ ४३॥
हे तात! अन्धकार तथा प्रकाश एक साथ विद्यमान नहीं रह सकते,