गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- अष्टावक्रगीता * ५२५
बुद्धिपर्यन्तसंसारे मायामात्रं विवर्तते।
निर्ममो निरहङ्कारो निष्कामः शोभते बुधः॥ ७३ ॥
संसारका पर्यवसान है बुद्धि और यहाँ मात्र मायाका विवर्त है। इस तत्त्वको जाननेवाला पुरुष काम, ममता और अहंकारसे रहित होकर शोभा पाता है॥ ७३ ॥
अक्षयं गतसन्तापमात्मानं पश्यतो मुनेः।
क्व विद्या क्व च वा विश्वं क्व देहोऽहं ममेति वा॥ ७४ ॥
जो तत्त्वज्ञ सन्तापसे रहित अपने अविनाशी स्वरूपको जानता है, उसके लिये विद्या कहाँ, विश्व कहाँ, देह कहाँ और अहंता-ममता कहाँ? ॥ ७४ ॥
निरोधादीनि कर्माणि जहाति जडधीर्यदि।
मनोरथान्प्रलापांश्च कर्तुमाप्नोति तत्क्षणात् ॥ ७५ ॥
अज्ञानी पुरुष यदि निरोधादि अभ्यासोंको छोड़ देता है तो वह दूसरे ही क्षण बड़े-बड़े मनोरथ और प्रलाप करने लगता है॥ ७५ ॥
मन्दः श्रुत्वापि तद्वस्तु न जहाति विमूढताम्।
निर्विकल्पो बहिर्यत्नादन्तर्विषयलालसः ॥ ७६ ॥
अज्ञानी ब्रह्म और आत्माके एकतारूप तत्त्वका श्रवण करके भी अपनी मूर्खताका परित्याग नहीं करता। वह बाहर तो प्रयत्नसे (कुछ क्षणके लिये) निःसंकल्प हो जाता है, परंतु उसके भीतर विषयोंकी लालसाका बीज बना ही रहता है॥ ७६ ॥
ज्ञानाद् गलितकर्मा यो लोकदृष्ट्यापि कर्मकृत्।
नाप्नोत्यवसरं कर्तुं वक्तुमेव न किञ्चन ॥ ७७ ॥
आत्मज्ञानसे जिसकी कर्म-वासना गल गयी है, वह लोकदृष्टिसे कर्म करता रहे तो भी उसके कुछ करने अथवा कहनेके लिये कोई अवसर नहीं मिलता। (वास्तवमें वह अकर्ता और अवक्ता ही है) ॥ ७७ ॥