गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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अकुर्वन्नपि संक्षोभाद्व्यग्रः सर्वत्र मूढधीः।
कुर्वन्नपि तु कृत्यानि कुशलो हि निराकुलः॥ ५८ ॥
अज्ञानी पुरुष कुछ न करता हो तब भी क्षोभवश सर्वत्र व्यग्र ही रहता है। स्थितप्रज्ञ (कुशल) पुरुष बहुत-से काम करता हुआ भी शान्त रहता है॥५८॥
सुखमास्ते सुखे शेते सुखमायाति याति च।
सुखं वक्ति सुखं भुङ्क्ते व्यवहारेऽपि शान्तधीः॥ ५९ ॥
स्थितप्रज्ञ पुरुष व्यवहारमें भी सुखसे बैठता है, सुखसे सोता है, सुखसे आता-जाता है, सुखसे बोलता है और सुखसे खाता भी है॥ ५९ ॥
स्वभावाद्यस्य नैवार्त्तिर्लोकवद्व्यवहारिणः।
महाह्रद इवाक्षोभ्यो गतक्लेशः स शोभते॥ ६० ॥
जो महाह्रदके समान अक्षुब्ध है और स्वभावसे ही जिसको व्यवहार करते रहनेपर भी साधारण लोगोंके समान पीड़ा नहीं होती, वह दुःखरहित ज्ञानी शोभायमान होता है॥ ६०॥
निवृत्तिरपि मूढस्य प्रवृत्तिरुपजायते।
प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलदायिनी॥ ६१ ॥
मूढ़की निवृत्ति भी प्रवृत्ति-जैसी हो जाती है। स्थितप्रज्ञकी प्रवृत्ति भी निवृत्तिका फल देती है॥ ६१ ॥
परिग्रहेषु वैराग्यं प्रायो मूढस्य दृश्यते।
देहे विगलिताशस्य क्व रागः क्व विरागिता॥ ६२ ॥
अज्ञानी पुरुष प्रायः गृह-द्रव्यादि पदार्थोंसे वैराग्य करता दीखता है, परंतु जिसका देहाभिमान नष्ट हो चुका है, उसके लिये कहाँ राग कहाँ विराग?॥ ६२ ॥