गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context* गणेशगीता *
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योगियोंके कुलमें जन्म लेते हैं॥ २५ ॥
पुनर्योगी भवत्येष संस्कारात्पूर्वकर्मजात्।
न हि पुण्यकृतां कश्चिन्नरकं प्रतिपद्यते॥ २६॥
और फिर पूर्व जन्मोंके संस्कारसे यह योगी होता है। कोई भी पुण्यकर्म करनेवाला नरकको नहीं जाता॥ २६॥
ज्ञाननिष्ठात्तपोनिष्ठात्कर्मनिष्ठान्नराधिप ।
श्रेष्ठो योगी श्रेष्ठतमो भक्तिमान् मयि तेषु यः॥ २७॥
हे राजन्! ज्ञाननिष्ठासे, तपकी निष्ठासे अथवा कर्मनिष्ठासे जो मुझमें भक्ति करता है, वह अत्यन्त श्रेष्ठ योगी है॥ २७॥
॥ इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगीतायां योगवृत्तिप्रशंसनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
छठा अध्याय
श्रीगणेशजीका राजा वरेण्यको अपने तात्त्विक स्वरूपका परिचय देना
श्रीगजानन उवाच
ईदृशं विद्धि मे तत्त्वं मद्गतेनान्तरात्मना।
यज्ज्ञात्वा मामसन्दिग्धं वेत्सि मोक्ष्यसि सर्वगम्॥ १॥
श्रीगणेशजी बोले—[हे राजन्!] इस प्रकार मुझमें मन लगाकर मेरा वह तत्त्व जानो, जिसके जाननेसे मुझे सर्वगत और यथार्थ जानकर मुक्त हो जाओगे॥ १॥
तत्तेऽहं शृणु वक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया।
अस्ति ज्ञेयं यतो नान्यन्मुक्तेश्च साधनं नृप॥ २॥
हे राजन्! लोगोंके ऊपर अनुग्रहकी इच्छासे वह तत्त्व मैं तुमसे वर्णन करता हूँ, जिसके जाननेसे दूसरे मुक्तिके साधन जाननेकी आवश्यकता नहीं रहती॥ २॥