गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context* भगवतीगीता * ४६५
धूमावती च मातङ्गी नृणां मोक्षफलप्रदा।
आसु कुर्वन् परां भक्तिं मोक्षं प्राप्नोत्यसंशयम्॥ २८॥
श्रीपार्वतीजी बोलीं—भूधर! मेरे स्थूल रूपोंसे यह सम्पूर्ण जगत् ही व्याप्त है, फिर भी शीघ्र मुक्ति प्रदान करनेवाली मेरी देवी-मूर्ति सर्वाधिक आराधनीया है। महामते! वे देवी भी मुक्तिदायिनी ‘(दस) महाविद्या’ नामसे अनेक स्वरूपोंवाली हैं। महाराज! मुझसे उनके नाम सुन लीजिये—महाकाली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, बगला (बगलामुखी), छिन्ना (छिन्नमस्ता), महात्रिपुरसुन्दरी, धूमावती और मातंगी नामोंवाली—ये मनुष्योंको मोक्षफल प्रदान करनेवाली हैं। इनकी परम भक्ति करनेवाला निःसंदेह मोक्ष प्राप्त कर लेता है॥ २५—२८॥
आसामन्यतमां तात क्रियायोगेन चाश्रय।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यसि निश्चितम्॥ २९॥
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।
न लभन्ते महात्मानः कदाचिदपि भूधर॥ ३०॥
तात! आप मन और बुद्धिसे मेरे प्रति समर्पित होकर इनमेंसे किसी एकका क्रियायोगके द्वारा आश्रय ग्रहण कीजिये। इससे आप निश्चितरूपसे मुझे प्राप्त कर लेंगे। भूधर! मुझको प्राप्त होकर महात्मालोग अनित्य तथा दुःखत्रयसे परिपूर्ण पुनर्जन्मको कभी नहीं पाते॥ २९-३०॥
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं मुक्तिदा राजन् भक्तियुक्तस्य योगिनः॥ ३१॥
यस्तु संस्मृत्य मामन्ते प्राणं त्यजति भक्तितः।
सोऽपि संसारदुःखौघैर्बाध्यते न कदाचन॥ ३२॥