गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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प्रमाणं भेदतो विद्धि लघुमध्यममुत्तमम्।
दशभिर्द्व्यधिकैर्वर्णैः प्राणायामो लघुः स्मृतः॥ २८ ॥
प्रमाणके भेदसे प्राणायाम लघु, मध्यम और उत्तम—तीन प्रकारका है, बारह अक्षरका प्राणायाम लघु कहलाता है॥ २८ ॥
चतुर्विंशत्यक्षरो यो मध्यमः स उदाहृतः।
षट्त्रिंशल्लघुवर्णो य उत्तमः सोऽभिधीयते॥ २९ ॥
चौबीस अक्षरोंका मध्यम और छत्तीस अक्षरोंका उत्तम कहा जाता है॥ २९ ॥
सिंहं शार्दूलकं वापि मत्तेभं मृदुतां यथा।
नयन्ति प्राणिनस्तद्वत्प्राणापानौ सुसाधयेत्॥ ३० ॥
सिंह, व्याघ्र अथवा मतवाले हाथीको जैसे मनुष्य नम्र करके अपने अधीन करता है, इसी प्रकार प्राण और अपान वायुको साधना चाहिये॥ ३० ॥
पीडयन्ति मृगांस्ते न लोकान् वश्यंगतान्नृप।
दहत्येनस्तथा वायुः संस्तब्धो न च तत्तनुम्॥ ३१ ॥
हे राजन्! जिस प्रकार अपने वशमें हुए सिंहादि मृगोंको सताते हैं, किंतु वशमें करनेवाले लोगोंको पीड़ा नहीं देते, इसी प्रकार यह वायु प्राणायामसे स्थिर होकर पापोंको भस्म करता है, परंतु शरीरको नहीं जलाता॥ ३१ ॥
यथा यथा नरः कश्चित्सोपानावलिमाक्रमेत्।
तथा तथा वशीकुर्यात्प्राणापानौ हि योगवित्॥ ३२ ॥
जिस प्रकार क्रमसे मनुष्य सीढ़ियोंपर चढ़ता है, इसी प्रकार योगीके लिये क्रमसे प्राणापानको वशमें करना उचित है॥ ३२ ॥