Skip to content
SarvaKosh
गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished675 pages

Page 43 of 675

Read in context
Page 43

४२ * गीता-संग्रह *


प्राणी, चाण्डाल और श्वान—इन सबमें समान दृष्टि रखते हैं॥ १७॥
वश्यः स्वर्गो जगत्तेषां जीवन्मुक्ताः समेक्षणाः।
यतोऽदोषं ब्रह्म समं तस्मात्तैर्विषयीकृतम्॥ १८॥
जिनका मन समतामें स्थित है, वे जीवन्मुक्त संसार और स्वर्गको जीत चुके हैं, कारण कि ब्रह्म निर्दोष और समतायुक्त है, इस कारण वे ब्रह्ममें स्थित रहते हैं॥ १८॥
प्रियाप्रिये प्राप्य हर्षद्वेषौ ये प्राप्नुवन्ति न।
ब्रह्माश्रिता असम्मूढा ब्रह्मज्ञाः समबुद्धयः॥ १९॥
जो महात्मा प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें हर्ष-शोक नहीं करते, वे समत्वबुद्धिसे युक्त ज्ञानीजन ब्रह्ममें स्थित तथा ब्रह्मके जाननेवाले हैं॥ १९॥

वरेण्य उवाच
किं सुखं त्रिषु लोकेषु देवगन्धर्वयोनिषु।
भगवन् कृपया तन्मे वद विद्याविशारद॥ २०॥
वरेण्य बोले— भगवन्! तीनों लोकों तथा देवता और गन्धर्व आदि योनियोंमें यथार्थ सुख क्या है ? हे विद्याविशारद! कृपाकर आप मुझसे यह वर्णन कीजिये॥ २०॥

श्रीगजानन उवाच
आनन्दमश्नुतेऽसक्तः स्वात्मारामो निजात्मनि।
अविनाशि सुखं तद्वि न सुखं विषयादिषु॥ २१॥
श्रीगणेशजी बोले— जो अपनी आत्मामें ही रमण करते हैं और कहीं आसक्त नहीं होते, वे ही आनन्द भोगते हैं, उसीका नाम अविनाशी सुख है, विषयादिकोंमें (वास्तविक) सुख नहीं है॥ २१॥
विषयोत्थानि सौख्यानि दुःखानां तानि हेतवः।
उत्पत्तिनाशयुक्तानि तत्रासक्तो न तत्त्ववित्॥ २२॥
विषयोंसे उत्पन्न हुए सुख तो दुःखके ही कारण हैं और उत्पत्ति