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गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)

Gita Sangraha 25 Gitas

by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि

DevanagariHindipublished675 pages

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३८८ * गीता-संग्रह *


एक-दूसरीमें व्यभिचार होनेके कारण ये (तीनों ही) एकमात्र कल्याणस्वरूप नित्य परब्रह्ममें मिथ्या हैं (अर्थात् उसमें इन वृत्तियोंका सर्वथा अभाव है) ॥ ३० ॥

देहेन्द्रियप्राणमनश्चिदात्मनां
\hspace{4em} सङ्घादजस्रं परिवर्तते धियः ।
वृत्तिस्तमोमूलतयाज्ञलक्षणा
\hspace{4em} यावद्भवेत्तावदसौ भवोद्भवः ॥ ३१ ॥

बुद्धिकी वृत्ति ही देह, इन्द्रिय, प्राण, मन और चेतन आत्माके संघातरूपसे निरन्तर परिवर्तित होती रहती है। यह वृत्ति तमोगुणसे उत्पन्न होनेवाली होनेके कारण अज्ञानरूपा है और जबतक यह रहती है, तबतक ही संसारमें जन्म होता रहता है ॥ ३१ ॥

नेतिप्रमाणेन निराकृताखिलो
\hspace{4em} हृदा समास्वादितचिद्घनामृतः ।
त्यजेदशेषं जगदात्तसद्रसं
\hspace{4em} पीत्वा यथाम्भः प्रजहाति तत्फलम् ॥ ३२ ॥

‘नेति-नेति’ आदि श्रुति-प्रमाणसे निखिल संसारका बाध करके और हृदयमें चिद्घनामृतका आस्वादन करके सम्पूर्ण जगत्‌को, उसके साररूप सत् (ब्रह्म)-को ग्रहण करके त्याग दे, जैसे नारियलके जलको पीकर मनुष्य उसे फेंक देते हैं ॥ ३२ ॥

कदाचिदात्मा न मृतो न जायते
\hspace{4em} न क्षीयते नापि विवर्धतेऽनवः ।
निरस्तसर्वातिशयः सुखात्मकः
\hspace{4em} स्वयम्प्रभः सर्वगतोऽयमद्वयः ॥ ३३ ॥

आत्मा न कभी मरता है न जन्मता है; वह न कभी क्षीण होता है और न बढ़ता ही है। वह पुरातन, सम्पूर्ण विशेषणोंसे रहित,