गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
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Read in context- रामगीता ( १ )*
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'तत्' और 'त्वम्' पद क्रमसे परमात्मा और जीवात्माके वाचक हैं
और 'असि' उन दोनोंकी एकता करता है॥२३॥
प्रत्यक्परोक्षादिविरोधमात्मनो-
र्विहाय सङ्गृह्य तयोश्चिदात्मताम्।
संशोधितां लक्षणया च लक्षितां
ज्ञात्वा स्वमात्मानमथाद्वयो भवेत्॥ २४॥
इन दोनों (जीवात्मा और परमात्मा)-में जीवात्मा प्रत्यक्
(अन्तःकरणका साक्षी) है और परमात्मा परोक्ष (इन्द्रियातीत) है,
इस (वाच्यार्थरूप) विरोधको छोड़कर और लक्षणावृत्तिसे लक्षित उनकी
शुद्ध चेतनताको ग्रहणकर उसे ही अपना आत्मा जाने और इस प्रकार
एकीभावसे स्थित हो॥२४॥
एकात्मकत्वाज्जहती न सम्भवे-
त्तथाजहल्लक्षणता विरोधतः।
सोऽयं पदार्थाविव भागलक्षणा
युज्येत तत्त्वं पदयोरदोषतः॥ २५॥
इन 'तत्' और 'त्वम्' पदोंमें एकरूप होनेके कारण जहतीलक्षणा
नहीं हो सकती और परस्पर विरोध होनेके कारण अजहल्लक्षणा भी
नहीं हो सकती। इसलिये 'सोऽयम्' (यह वही है) इन दोनों पदोंके
अर्थकी भाँति इन 'तत्' और 'त्वम्' पदोंमें भी भागत्यागलक्षणा ही
निर्दोषतासे हो सकती है*॥२५॥
* जहाँ शब्दोंके वाच्यार्थ (अर्थात् उनकी शक्तिवृत्तिसे सिद्ध होनेवाले अर्थ)-को
छोड़कर दूसरा अर्थ लिया जाता है, वहाँ लक्षणावृत्ति होती है। वह जहती, अजहती और
जहत्यजहती नामसे तीन प्रकारकी है। जहतीलक्षणामें शब्दके वाच्यार्थका सर्वथा त्याग
करके उसका बिलकुल नया ही अर्थ किया जाता है। जैसे 'गङ्गायां घोषः' (गंगाजीपर
पशुशाला है) इस वाक्यके वाच्यार्थसे गंगाजीके प्रवाहपर पशुशालाका होना सिद्ध होता
है। परन्तु यह सर्वथा असम्भव है। इसलिये यहाँ 'गंगा' शब्दका अर्थ 'गंगाप्रवाह' न