गीता-संग्रह (२५ प्राचीन गीताएँ)
Gita Sangraha 25 Gitas
by महर्षि वेदव्यास / भगवान दत्तात्रेय आदि
Page 384 of 675
Read in context- रामगीता ( १ ) * ३८३
एकमात्र ज्ञानस्वरूप, निर्मल और अद्वितीय है। अतः (बोध हो जानेपर)
फिर अविद्या उत्पन्न नहीं होगी॥ १७॥
यदि स्म नष्टा न पुनः प्रसूयते
कर्ताहमस्येति मतिः कथं भवेत्।
तस्मात्स्वतन्त्रा न किमप्यपेक्षते
विद्या विमोक्षाय विभाति केवला॥ १८॥
जब एक बार नष्ट हो जानेपर अविद्याका फिर जन्म ही नहीं होता तो बोधवान्को ‘मैं इस कर्मका कर्ता हूँ’—ऐसी बुद्धि कैसे हो सकती है? इसलिये ज्ञान स्वतन्त्र है, उसे जीवके मोक्षके लिये किसी और (कर्मादि)-की अपेक्षा नहीं है, वह स्वयं अकेला ही उसके लिये समर्थ है॥ १८॥
सा तैत्तिरीयश्रुतिराह सादरं
न्यासं प्रशस्ताखिलकर्मणां स्फुटम्।
एतावदित्याह च वाजिनां श्रुति-
र्ज्ञानं विमोक्षाय न कर्म साधनम्॥ १९॥
इसके सिवा तैत्तिरीय शाखाकी प्रसिद्ध श्रुति^१ भी आग्रहपूर्वक स्पष्ट कहती है कि समस्त कर्मोंका त्याग करना ही अच्छा है तथा ‘एतावत्’ इत्यादि वाजसनेयी शाखाकी श्रुति^२ भी कहती है कि मोक्षका साधन ज्ञान ही है कर्म नहीं॥ १९॥
विद्यासमत्वेन तु दर्शितस्त्वया
क्रतुर्न दृष्टान्त उदाहृतः समः।
फलैः पृथक्त्वाद्वहुकारकैः क्रतुः
संसाध्यते ज्ञानमतो विपर्ययम्॥ २०॥
और तुमने जो ज्ञानकी समानतामें यज्ञादिका दृष्टान्त दिया सो
१-‘न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः।’ (तै० आ० १०।१०)
२-‘एतावदरे खल्वमृतत्वम्’ (बृ० उ० ४।५।१५)।